हर लड़की में निहित अमृता को जगाना होगा….

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सत्यदेव त्रिपाठी। रींवा जैसे अपेक्षाकृत कम विकसित शहर के निवासी योगेश त्रिपाठी लिखित नाटक ‘मुझे अमृता चाहिए’ को मुम्बई के नये रंगसमूह ‘कारवाँ’ ने अपनी पहली प्रस्तुति के रूप में खेला है। नाटक इस बात का खास पता देता है कि नारी-आन्दोलनों की सारी हलचल के बावजूद स्त्री-जीवन की आम व प्रतिनिधि समस्यायें साहित्य व कला में आज भी सही स्थान नहीं पा सकी हैं।

नाटक में मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार की लड़की है – विजया। यूँ तो बी.ए. पास है, प्राइवेट एम.ए. भी कर रही है, लेकिन असल में वह घर में माँ और रिटायर्ड पिता की सेवा व कमाती भाभी की टहल के सिवा कुछ नहीं करती…। मध्यवर्गीय़ पारिवारिक व्यवस्था में उसका एकमात्र भविष्य है शादी, जो लडकी के रंग-रूप को लेकर ग़ैरज़रूरी मीन-मेख एवं दलाली व दहेज के रूप में लाखों की नक़दी से सामानों तक की घिनौनी सौदेबाजी में पिस रहा है…। इन सबसे उपजते हीनभाव में छीज रही है विजया की मेधा। नष्ट हो रहा है उसका व्यक्तित्त्व एवं समूचा जीवन। यही कहानी है घर-घर की, हर लडकी की…गाँव-कस्बे से लेकर शहर तक…।

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लेकिन यहाँ इसके आगे की बात आती है – ‘नाटक में नाटक’ के माध्यम से। स्थानीय रंगमण्डली में एक सहेली के जरिये विजया को अभिनय का मौका मिलता है। वर्गीय मानसिकता में पूरे घर के एतराज के बावजूद इस समूची स्थिति से त्रस्त पिता अपनी बेटी को काम करने की छूट दे देता है। फिर तो दफ्तर में अमृता नामक अफसर की मुख्य भूमिका में विजया के व्यक्तित्त्व का जो विकास होता है, उसमें जो आत्मविश्वास पैदा होता है कि दहेज के बल शादी की बलि चढती वस्तु (जिंस) से जीती-जागती मानवी में बदल जाती है। विजया से अमृता बनकर ख़ुद तो इस सडाँध मुक्ति पाती ही है, पिता-माता भी सुख-चैन की साँस लेते हैं। हर लडकी में ऐसी अमृतायें छिपी हैं, जिन्हें जगाना ही इस नाटक का मक़सद व उस जीवन की सम्भावना है।

लेखन में नियोजित इस स्थिति और गति को अभिषेक नाराय़ण के बिल्कुल नये नाट्यसमूह ‘कारवाँ’ (मुम्बई) ने अपनी पहली प्रस्तुति के रूप में दर्शक तक ठीक-ठीक पहुँचाने की प्रतिबद्धता के साथ इसे मंच पर उतारा है। और चण्डीगढ से मुम्बई तक के अपने लम्बे नाट्यानुभवों और ढेरों सीरियलों से कुछ फिल्मों तक की विरासत लिये निर्देशक राजेश बब्बर ने इसी नीयत के साथ नाट्य-कला के हर सम्भव व वाजिब सलीकों-माध्यमों के कुशल प्रयोगों से प्रस्तुति को अंजाम दिया है। घर व नाट्यस्थल पर घटती कहानी को समानांतर रूप से मंच के दो हिस्सों में पूरी सफाई से पेश करने की सूझ में निहित बूझ सराहनीय है। मुकुल नाग की सटीक सेट-संरचना और रोहित चौधरी के समुचित प्रकाश से आलोकित होते हुए दोनो ही स्थलों के दृश्य-विधान कथा व कथ्य को बख़ूबी व्यक्त कर पाते हैं। नाट्य-दृश्यों को व्यंजक व रोचक बनाते हुए नरोत्तम शर्मा के मौजूँ गीत पंकज दीक्षित के संगीत के साथ उनके व सोहिनी नियोगी के स्वरों में प्रस्तुति को लहका देते हैं और चार-चाँद लगाते हैं मीनाक्षी चन्ना के नृत्य-वितान।

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इन नाट्य आयामों के साथ नाटक के पात्रों को अपने-अपने अभिनय-कौशल को साकार करने का भरपूर मौका व सहाय मिला है। नाटक तो नियति की शिकार, गुमसुम-लाचार विजया से अपनी जिन्दगी की नियामक बनती समर्थ अमृता का है। इन दो परस्पर विरोधी रूपों के साथ सुख-दुख, प्रेम-उपेक्षा, आक्रोश-बेबसी…आदि भावों व थसमसाने से नाचने-कूदने तक की गतियों…जैसे सब कुछ को जितना अच्छा साकार किया है मुद्रिका गुप्ता ने, उतनी ही गुंजाइश भी पैदा की है मँजाव-निखार की। इसके बाद, बल्कि पहले भी, सबमें अग्रणी हैं पिता के रूप में सब कुछ के संचालक, भोक्ता व प्रस्तुति के प्राण बने वरिष्ठ कलाकार मुकुल नाग। उनका काफी दिनों बाद मंच पर आना बहुत प्रीतिकर लगा – सहज-संतुलित, पर गहरा प्रभाव छोडने वाला। शादी कराने वाले टिपिकल मामा के पात्र में कैरिकेचर बनने की पूरी सम्भावना है, पर अनुभवी जयशंकर त्रिपाठी ने दोनो प्रवेशों में अपनी मारक अदा व नज़ूमी आवाज तथा सधी-बेढंगी मुद्राओं-गतियों से भूमिका व प्रस्तुति को ऐसा लहका दिया है। नाट्य-निर्देशक अरविन्द में प्रतिभाशाली नकचढे शख़्स से एक सहज-संरक्षक बनने की यात्रा है, जिसे अभिषेक नारायँ अपनी साफ-सधी ज़ुबान व आकर्षक धज से पूरी करते हुए ध्यान खींचते हैं। नाटक वाले हिस्से के शेष किरदार सहायक भूमिकाओं को बख़ूबी अंजाम देते हैं। परिवार वाले हिस्से में कल्पना पचौरी माँ जैसी माँ व सास जैसी सास को सही निभाती हैं। बहू को सबकुछ करते हुए कुछ नहीं करना है और बेटे को कुछ न करते हुए सबकुछ करने का फड बाँधना है, जिसे देसिरी संगमा व वासिल ख़ान ने जस का तस किया व तस का जस असर छोडा है।

इस प्रकार विद्रूप यथार्थ के पते देने से लेकर उससे निजात की आश्वस्ति देती यह कृति-प्रस्तुति देश के वृहत्तर समाज का दर्पण भी है और दीपक भी, जिसके लिए लेखक व प्रस्तोता सचमुच साधुवाद के हक़दार हैं। यदि जीवन की अनुकृति है साहित्य, जिसमें जीवन को बेहतर बनाने के विचार संकेत बनकर आते हैं, तो उन्हीं विचार-संकेतों को सजीव कर देता है रंगमंच। अस्तु, आगे की प्रस्तुतियों में दीपक वाले हिस्से पर पिता की जानिब से कुछ और ज़ोर दिया जा सके, तो पारिवारिक संरचना में बदलाव के लिए अधिक कारगर सिद्ध होगा…।

और अधिकाधिक शोज़ ही इस नाटक की सच्ची सार्थकता होगी। यह प्रस्तुति ग्राम-विकास के सरकारी-ग़ैरसरकारी संस्थानों वाले कार्य का हामी है। मुलाहिज़ा हो कि वे संस्थान सुदूर इलाकों में इसके अधिकाधिक शोज़ प्रायोजित करके अपने कर्त्तव्य का बेहतर निर्वाह कर सकते हैं…।

satya dev tripathiयह आलेख देश के प्रसिद्ध नाट्य समीक्षक सत्यदेव त्रिपाठी से प्राप्त हुआ है। उनका संपर्क है  – नीलकण्ठ, एनएस रोड नं -5, विलेपार्ले-पश्चिम, मुम्बई-400056

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