इंदिरा का लगाया आपातकाल अब भी मौजूद है, रंग बदला है और नाम भी

on

|

views

and

comments

indira-gandhi-आज सबसे पहले बात देश के लोकतांत्रिक इतिहास में काले धब्बे की तरह माने जाने वाले आपातकाल की। 25 जून 1975 की वो तारीख जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की। देश स्तब्ध था और राजनीतिक दल हैरान। लेकिन इंदिरा तो इंदिरा थीं। लिहाजा तमाम विरोधों के बीच आपातकाल जारी रहा। आज हम 1975 के आपातकाल की बात तो करेंगे ही लेकिन मौजूदा दौर में जब ये तय किया जाने लगे कि क्या खबर जनता तक पहुंचेगी और क्या नहीं तो क्या माना जाए कि आपातकाल अपना रूप, रंग बदल चुका है। क्या लोकतंत्र में आपातकाल ने सेंध लगा ली है।

25 जून 1975

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का वो दिन जिसे काला दिन कहा जाता है। दरअसल 1971 में हुए आम चुनावों में रायबरेली में इंदिरा गांधी से हारने के बाद राजनारायण ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। राजनारायण ने आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव धोखाधड़ी कर और तय सीमा से अधिक पैसा खर्च कर जीता है। कोर्ट में ये आरोप साबित हुए और अदालत ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द करने करने के आदेश दिए लेकिन ये आदेश अमल में लाए जाते उससे पहले ही

इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल का ऐलान कर दिया।

ये एक ऐसी काली रात थी जिसे भारतीय लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए था। 26 जून की सुबह होते होते इंदिरा गांधी से राजनीतिक रुप से अलग सोच रखने वाले कई बड़े नेता जेल में जा चुके थे। जल्द ही कई और नेताओं को भी जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। न कोई बहस, न सुनवाई। सीधा जेल।

Emergency-1

फिर याद कीजिए तो मीसा यानी मेनटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत पुलिस जिसे चाहे उसे पकड़ सकती थी और पकड़े गए शख्स को बिना कोर्ट में हाजिर किए जेल में डाल सकती थी। आपातकाल के विरोध में देशभर में प्रदर्शन हो रहे थे। और पुलिस इन प्रदर्शनकारियों को पकड़ कर जेल में डाल रही थी।

ये वो दौर था जब इंदिरा का हुक्म ही देश में पहला और आखिरी शब्द हुआ करता था। देश के लोकतंत्र से विपक्ष खत्म हो चुका था और इंदिरा की सत्ता ही अंतिम सत्य था।

देश चल तो रहा था लेकिन राजनीतिक विरोध के लिए कोई जगह न थी यहां तक कि प्रेस पर भी पाबंदी थी। इंदिरा गांधी का विरोध करती खबरों को न छापने की सख्त हिदायत थी। ऐसी खबरों को सेंसर कर दिया जाता है। तो एक दौर ये भी था।

Emergency poster

फिर लौटिए तो मौजूदा दौर की राजनीति को भी समझ लीजिए क्योंकि विपक्ष विहीन सत्ता चलाने का सपना तो मौजूदा दौर में भी देखा जा रहा है। फिर पीएम मोदी तो ये कहते रहें हैं कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाना ही उनका मकसद है। फिर ऐसे में सवाल तो यही है कि क्या विपक्ष विहीन लोकतंत्र वास्तविक लोकतंत्र होता भी है। तो फिर क्यों न इसे भी आपातकाल की ओर बढ़ने की शुरुआत माना जाए जब न विपक्ष होगा और न विपक्ष के मुद्दे। होगा तो सिर्फ सत्ता का सुख।

फिर प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक तो इंदिरा गांधी ने भी लगाई थी तो प्रेस को मैनेज करने का काम अब भी होता है। बस अंदाज जुदा है। क्योंकि तब का प्रेस अब मीडिया बन चुका है और लोकतंत्र में सरकार बना और गिरा सकने की स्थिती में आ चुका है। फिर याद कीजिए तो इंदिरा गांधी के दौर में सत्ता के खिलाफ खबरें लिखने की मनाही थी तो मौजूदा दौर में मीडिया ही आखिरी फैसला सुना देती है।

2014 में नरेंद्र मोदी के एक राष्ट्रव्यापी नेता बनने में मीडिया की वो भी खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका से इंकार किया भी नहीं जा सकता।

फिर नजर डालिए तो अमित शाह अहमदाबाद के जिस सहकारी बैंक के अध्यक्ष हैं उस बैंक में नोटबंदी के दौरान महज पांच दिनों में ही 746 करोड़ रुपए जमा हुए। आरटीआई के जरिए हुए इस खुलासे की खबर छपने के कुछ देर के बाद ही अधिकतर अखबारों की वेबसाइट्स ये इन खबरों के लिंक हटा लिए गए। अधिकतर अखबारों ने न ये खबर छापी और न ही मुख्य धारा के इलेक्ट्रानिक समाचार चैनलों ने इस खबर पर बहस की।

हालांकि बाद में देश में सहकारी बैंकों का कामकाज देखने वाली संस्था नाबार्ड ने पांच दिनों में 746 करोड़ रुपए जमा होने को सामान्य घटना बता कर मामले में डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश जरूर की।

तो ऐसे में क्या मान लिया जाए कि आपातकाल का रूप रंग और उसे संबोधित करने के तरीके बदल गए हैं। क्योंकि देश के आम नागरिक को समाचारों के जानने का अधिकार तो है लेकिन राजनीतिक दबाव उसे इस अधिकार से दूर करता है।

तो फिर लौटिए तो आपातकाल को लागू करना इंदिरा के लिए आत्मघाती कदम साबित हुआ। 21 मार्च 1977 को आपातकाल खत्म हुआ और उसके बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। तो समझिए कि न आपातकाल ही अंतिम सत्य है और न सत्ता। है कुछ है तो वो है लोकतंत्र।


Share this
Tags

Must-read

त्रिवेंद्र का इस्तीफा रीजनल मीडिया के लिए एक सबक है, हम बीमार हो गए हैं…

  उत्तराखंड में हुआ सियासी घटनाक्रम भारत की रीजनल मीडिया के लिए एक सबक है। उत्तराखंड में रीजनल मीडिया खासी सशक्त है और अपना प्रभाव...

काशी रहस्य।। सुनो, मैं मणिकर्णिका हूं – भाग 3

  मणिकर्णिका का तिलिस्म और कालरात्रि सुनो, मैं मणिकर्णिका हूं। कल मैंने बिस्सू भैय्या और दैय्या गुरू का किस्सा सुनाया था। यकीन मानों उसके बाद पूरी...

काशी रहस्य।। सुनो, मैं मणिकर्णिका हूं – भाग 2

सुनो, मैं मणिकर्णिका हूं !!! रूप बदलती भैरवी और बाबा मसान नाथ के साधक... सुनो, मैं मणिकर्णिका हूं। उस दिन मैंने तुम्हें अपनी इस धरा के...

Recent articles

कुछ और चुनिंदा लेख

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here