अगर आपके सामने किसी लड़की से छेड़छाड़ हो तो आप पहले अपना फेसबुक लॉगइन करेंगे…पक्का

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हो सकता है कि शीर्षक आपको बुरा लगे लेकिन वर्तमान समाज के अध्ययन और अनुभव के आधार पर इकट्ठा की गईं तस्वीरें मिला कर देखी जाएं तो कुछ ऐसा ही दृश्य बनकर उभरेगा। थोड़ी देर के लिए कल्पना लोक में चलिए और आगे की लाइनों को अपने दिमाग में (फेसबुक और व्हाट्सअप से हटाकर) सजीव कीजिए।

दृश्य – एक रेलवे स्टेशन का प्लेटफार्म।

कई लोग आने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहें हैं। भीड़ में महिला पुरुष सभी शामिल हैं। आधे से अधिक लोगों के सिर झुके हुए हैं। दुनिया की खबर लेने के लिए वो अपने आसपास की दुनिया से बेखबर हैं। कई लोगों के कान खुद की पसंद की आवाज से इतने घिरे हैं कि कोई चीख भी ले तो उन तक न पहुंचे।

(आप अपने दिमाग में ये दृश्व सजीव तो कर रहें हैं ना?)

इसी बीच एक शख्स हमारे बीच से ही निकलता है और एक महिला से सार्वजनिक तौर पर छेड़छाड़ शुरु कर देता है। महिला स्तब्ध है। शख्स मानसिक विकार से भरा है। दोनों के चेहरे पर परस्पर विरोधी विचार तेजी से उभरे हैं। महिला उस शख्स से दूर होने की कोशिश में छटपटा रही है। शख्स अपने विकारों को व्यवहार में लाने को आतुर है। महिला को कस कर पकड़ने की कोशिश में है। कुछ सेकेंडो की परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाओं के बाद आखिरकार शख्स महिला को छोड़ कर वापस लौट आता है। उसी भीड़ में फिर से शामिल होने के लिए।

महिला अवाक खड़ी है। 

इस पूरे प्रकरण के दौरान आसपास की भीड़ चुप्पी की आड़ लिए चुपचाप खड़ी है। कुछ लोग जो निस्तेज नहीं थे वो ‘सोशल’ हो गए। अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इस घटना को अपलोड करने के लिए वो अपने एचडी रिकार्डिंग वाले मोबाइल फोन को निकाल कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहें हैं।

दृश्य समाप्त।

जी, यही होता है अब। आज किसी के साथ हुआ, कल किसी के साथ होगा। ये नहीं कहना चाहिए कि आपके साथ भी हो सकता है लेकिन हो तो सकता है। नवी मुंबई के तुर्भे रेलवे स्टेशन पर भी यही हुआ। एक महिला के साथ एक अधेड़ शख्स छेड़छाड़ कर चला गया और लोग तमाशबीन बने देखते रहे। भला हो सीसीटीवी का जिसने आरोपी की पहचान करा दी और पुलिस ने उसे पकड़ लिया।

इस पूरी घटना के बाद ये सवाल खुद से पूछा जा सकता है कि अगर हम उस जगह मौजूद होते तो क्या करते? जैसा कि उस लड़की के पास लोग मौजूद थे लेकिन किसी ने भी आगे बढ़कर छेड़छाड़ करने वाले शख्स को रोकने और पकड़ने की कोशिश नहीं की क्या वही हम भी करते?

ये हमारी संवेदनशीलता के मरने भर का नहीं कानूूनी पचड़े से बचने की आड़ लेकर हमारे कायर हो जाने की गवाही भी है। हम अपने बनाए कानूनों के कैसे शिकार हो सकते हैं?

फेसबुक पर लॉगइन सोसायटी के सोशल एथिक्स इतने कमजोर हैं कि हम अपने सामने घट रहीं गलत घटनाओं का प्रतिकार करने के लिए अपने स्टेटस के अपलोड करने का इंतजार कर रहें हैं।

चलिए, वो वीडियो देखते हैं फिर आपको अपने नोटिफिकेशन भी तो चेक करने हैं।

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