साहित्य विशेष: नब्बे पार के नामवर सिंह और जनार्दन सिंह भी – शिष्ट बनाम लोक जन

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पिछले दिनों बाणभट्ट और उनकी कादम्बरी के रचना-लोक की खोज में लगभग एक सप्ताह ‘मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय’ के दल के साथ विध्याटवी के चन्द्रेह, भवँरसेन, सीधी और रींवा… आदि इलाके की यात्रा का संयोग बना…। यात्रा के चौथे दिन हम भगत, फाग… आदि नृत्य-गायन की कलाओं के खाँटी प्रदर्शन देखने एक सुदूर गाँव ‘लकोडा’ पहुँचे।

वहाँ फाग गाने वाली टोली का नेत्तृत्त्व कर रहे थे एक बूढे जालपा-से सज्जन। सर पर किंचित बडी-सी पगडी तले पतला-सा चेहरा यूँ ही छोटा दिख रहा था, ऊपर से बिना दाँतों के कारण  पिचके गालों के साथ और भी चिचुका-सा नुमायां हो रहा था। बस, सफाचट बनी दाढी पर क़ायदे से छँटी मूँछों की सफेदी ही एक अलग रंगत दे रही थी। आधी बाँह की ढीली-मैली कमीज़ अपने नीचे छिपे शरीर के एक तँतिया होने का पता दे रही थी। लेकिन हाथों से ताल और सुर के इशारे के साथ मुखडे को कढाने और फिर बंध को सम पर खींच कर उठाने का ओज उस कृश-काया को धता बता रहा था। पूरी मण्डली उनके इशारों पर बजा और उनके ताल पर गा रही थी और झूम रहे थे श्रोता…। कुछ ऐसा विरल-सा समाँ बँधा कि मैं उठकर फोटो लेने और आयोजक से उनके बारे में पूछने से अपने को रोक न सका…।

नरेन्द्र ने बताया कि वे हमारे -याने पूरे लकोडा गाँव के- बब्बा हैंनाम है जनार्दन सिंह। सारे गाँव को उन्होंने ही गाना सिखाया है। 90 पार के तो हैं ही, पर आज भी कोई गायन उनके बिना नहीं होता – न कोई उनके बिना गाता, न वे बिना गाये रह पाते…।

मैं तो वैसे ही लरज उठा था इस शख़्सियत को देखकर ही… उनके घर जाकर और सब देखना-जानना चाह रहा था, लेकिन 90 पार की उम्र का जिक्र सुनते ही चटकन-सा लगा… याद हो आया वह साक्षात्कार, जो उन दिनों बिल्कुल ताज़ा-ताज़ा था कि पिछले दिनों कैसे और क्यों  एनडीटीवी ने हिन्दी साहित्य के स्वनाम धन्य आलौचक के राजधानी स्थित आवास पर अपनी टीम भेजकर नब्बे पार के नामवर सिंह की मिज़ाज-पुरसी की…। मैं उसी के गहरे असर में रहा…। फिर जनार्दन सिंह के घर जाकर हुई सारी बातचीत के दौरान अनायास ही समानांतर रूप से मेरे सामने नामवरजी के आलोक में ही भास्वर होते चले गये जनार्दनजी और जनार्दन सिंह के बरक्स कुछ और तरह से खुलते गये नामवरजी…, जिसमें बुनती-बनती प्रकट होती गयी अपने खाँटी लोक जन बनाम शीर्ष पर बैठे शिष्ट जन की निहित प्रकृति, नियति और नीयत भी…!! और महीने भर बाद जब लिखने बैठा, तो उसी दौरान पढने को मिल गया नवभारत टाइम्स में नामवरजी का साक्षात्कार, जो इसमें पूरक का अच्छा कारक बन गया….।

जनार्दनजी के घर जाने की शुरुआत इस शर्म से हुई कि मेरे जाने का कोई मक़सद ही नहीं – बस एक अचानक पैदा हुआ विस्मय और भावुक फ़िदाई…। जबकि एनडी की भूमिका में महनीय मकसदों की एक बडी मौजूँ फेहरिस्त रही, जिसमें साहित्य और शिक्षा की महत्ता तथा दोनो के साधक की अक्षय इयत्ता से लेकर समूचे साहित्य में ‘सर्वाधिक मर्यादित और विवादित’ की खोज-ख़बर लेने का ऐतिहासिक कार्य अँगडाइयां ले रहा था…। विवाद तो सौ प्रतिशत सही और स्वयं नामवरजी द्वारा (विनोद में ही सही) उद्धृत ‘जो सुलझ जाती है उलझन, फिर से उलझाता हूँ मैं’ से प्रमाणित। लेकिन हिन्दी साहित्य में ‘नामवर के बिना कोई मर्यादा नहीं…’, से ज्ञान-वर्धन हुआ कि हिन्दी के भुवंगत साहित्यकारों को कौन कहे, दिवंगत आचार्यों (रामचन्द्र शुक्ल, म.प्र. द्विवेदी, ह.प्र. द्विवेदी व रामविलास शर्मा…आदि) की भी कोई मर्यादा नहीं!! ख़ैर, एनडी टीवी ने ऐसे ‘नामवर’ लोगों के लिए कुछ न करने (उनके फोटो तक न रखने) वाली दुनिया व मीडिया की लानत-मलामत की और गोया सबकी इकबारग़ी क्षतिपूर्त्ति करने का सेहरा बाँधने के अन्दाज़ में अमितेश जी को रवाना किया…

जनार्दन सिंह के घर की तरफ जाते हुए ख़याल आया कि बकौल एनडी टीवी कहाँ ‘हिन्दी जगत का वह अलबेला नायक’, और कहाँ यह अनाम व प्राय: अनपढ-सा (दर्ज़ा आठ पास) गँवईं आदमी जनार्दनजी, जो ऊँचे-खाले चलते-फाँदते बतियाते आगे-आगे और उस इतने बडे चैनल तथा उसके मक़बूल संयोजक के मुक़ाबले झूरी थाह पर एक काग़ज़-कलम जेब में रखे पीछे-पीछे मैं – साथ में स्थानीय आयोजक व रंगमित्र रोशनी प्रसाद मिश्र…!! अरे हँसेंगे लोग…पर क्या कर सकते हैं – ‘हँसिबे जोग, हँसे, नहिं खोरी’!! जब जनार्दनजी अपनी सहन में जाने के लिए सरपत-फूस से बनी बाड हटाने लगे, तो मुझे कैमरे में नुमायां शीर्ष समालोचक के शिवालिक अपार्ट्मेण्ट की सीढियां दिखने लगीं…जहाँ दरवाज़ा खोलते हुए प्रकट हुए हिन्दी समीक्षा के बेताज़ बादशाह… अपने ही घर के संगेमरमर के फर्श पर पाँव घसीटते हुए…।

पर दो बातें दोनो में समान मिलीं – एक तो यह कि दाँत दोनो ने नहीं लगवाये…, जिसकी बावत जनार्दनजी ने अपनी बेफिक्री में कहा – ‘तीस सालों से ऐसे ही खा रहा हूँ – क्या फर्क़ पडता है?’ याने उनको इसकी पडी ही नहीं, लेकिन नामवरजी ने ख़ास जिक्र किया – ‘ये काम मैंने नहीं किया – नकली दाँत बनाकर जवान दिखना…मनुष्यता का अपमान है’…कहते हुए अपनी घनघोर वैज्ञानिक दृष्टि स्थापित की, जिस पर दंत चिकित्सक ख़ास मुलाहिज़ा फ़रमायें कि दाँत खाने के लिए नहीं, जवान दिखने मात्र के लिए लगाये जाते हैं और यह (गोया पापकर्म) उन्होंने नहीं किया…। दूसरे यह कि भगवान में दोनो ही मानते हैं। लेकिन जनार्दनजी ने ईश्वर के होने में कभी शंका ही नहीं की। वे सीधे-सीधे अपने को परम पिता की संतान मानते हैं और उन्हीं में अपना पर्यवसान – ‘तुममें उतपति, तुममें बास’…। लेकिन नामवरजी रोज़मर्रा के मुहावरे की तरह बोल रहे थे, जिसमें ‘ईश्वर ने ही पीछे देखने का नहीं बनाया है…’ जैसे वाक्यों में बार-बार भगवान के आने पर अमितेशजी ने बडे पते (मार्के) की बात पूछी – ‘आप तो मार्क्सिस्ट रहे हैं… भगवान पर…’ तब तक हँसते हुए लोक लिया नामवरजी ने – ‘अरे मुहावरा है’..जैसे मुस्लिम ‘या ख़ुदा’ कहता है, अंग्रेजी में ‘ओ माइ गॉड’ कहते हैं, तो हमारा ईश्वर क्या उनसे कमज़ोर है?? फिर इधर नभाटा से कहा कि आजकल सुबह नहा-धोके चाय के बाद रामचरित मानस का पाठ करते हैं, उसके बाद ही कुछ खाते हैं…। यह सब स्वयं बाबा मार्क्स सुन लें, तो नामवरजी के हाथ में माला ही न दे दें। अचानक इस आस्था का राज़ सिर्फ़ जईफी है या हवा के माफिक चलने की आदत में भाजपा की हवा के साथ होकर कुछ हासिल करने का एक और पैंतरा..?? मेयार सच्चे मार्क्सवादी का तो वो है कि मरते हुए भी जब ‘अबोध बच्चे को मोक्ष दिलाने की करुणा’ करने पादरी आया और बोला – ‘हेलो, आइ ऐम द मैन, फ्रॉम गॉड’ तो उस बन्दे का आख़िरी वाक्य था – ‘शो योर क्रोडेंशियल्स’ – दिखाओ अपना पहचान पत्र…। खैर,

बात चल रही थी जनार्दन और नामवरजी की बातों में समानता की, तो हम बात करने वालों में भी एक बात समान मिली है – मैं भी जनार्दनजी के बारे में कुछ न जानता था और अमितेशजी भी साहित्य और नामवरजी के बारे में कुछ सुनी-सुनायी के अलावा लगभग कुछ नहीं जानते थे (जैसा कि लगा उनकी बात और तरीके से…)। एनडी टीवी ने इतना बडा सेहरा बाँधा, तो कम से कम एक जानकार आदमी भेज देते!! बहरहाल…,

एनडी टीवी के कैमरे में दिखीं मोटी-मोटी सजी-बिखरी किताबें और किताबें… (भूमिका में उल्लिखित बाथरूम की किताबें शायद नहीं आयीं कैमरे में) एवं भिन्न-भिन्न स्थानों की तस्वीरें …और यहाँ जनार्दनजी के दुआरे से घर में तक बिखरे चैती की फसल के अनाज व भूसे-डण्ठल… नामवरजी के कहे ‘मरेंगे हम किताबों में, वरक़ होगा कफ़न अपना…’ के वजन पर जनार्दनजी भी कहें, तो ‘मरेंगे हम अनाजों में, भूसा होगा कफ़न अपना’…। इन्हीं सबके बीच बमुश्किल एक बसहटा (बाँस की बनी छोटे आकार की चारपाई) बिछायी गयी, जिस पर बैठते ही जनार्दनजी ने पूछ लिया – ‘पण्डितजी, का ली आईं – पानी…शर्बत…’? ख़ाँटी गँवईं संस्कार से प्रेरित उनकी यह पहल मेरे एजेण्डे में न थी, क्योंकि मैं तो एनडी टीवी के ‘अब कोई नामवर नहीं होगा’ के बरक्स तय कर चुका था कि जो ‘शिवालिक’ में नहीं हुआ, ‘लकोडा’ में नहीं होगा…। और वहाँ समीक्षक-प्रवर ने तो पानी तक को न पूछा, वरना जब अमितेश का नामवरजी को पानी पिलाना कैमरे में आ सकता है, तो नामवरजी का पूछना भी आता…। और न पूछना उस बनारस और गाँव की मूल प्रवृत्ति आज भी नहीं है, जिसका पूरी बात के दौरान मौका निकालकर राग अलापते रहे मान्यवर नामवरजी…। लेकिन बडे आलोचक का रुआब कहें या फिर खाँटी राजधानी कल्ट…कि उनका ‘बनारसीपना’ बस, अपने पान खाने की, उन्हीं के शब्दों में, ‘कुटेव’ (बुरी आदत) की पुष्टि भर रहा और ‘गाँव का आदमी होना’ किसी साक्षात्कार में रचना के साथ समीक्षा के विकसित होने की तुलना के लिए ‘पानी के साथ धान के बढने’ में कभी सुना गया था…। ‘नभाटा’ के साक्षात्कार से ये पता चला कि आजकल ‘शिवालिक’ के ‘सर्वेण्ट क्वार्टर’ के परिवार के भरोसे  ‘मरूंगा मैं सुखी’ के लिए ‘जीवन की धज्जियां उडाने’ वाले अज्ञेय-चिंतन को साध रहे…।

जनार्दन सिंह से मेरा संवाद उनकी बघेली और मेरी भोजपुरी में हुआ, जिसे मैं यहाँ हिन्दी में प्रस्तुत कर रहा…। लेकिन दोनो भाषाओं में 5-10% से अधिक न फर्क़ है, न हमारी बातचीत पर कोई फर्क़ पडा। नामवरी-साक्षात्कार के प्रभाव में डूबा मैं अचानक पूछ बैठा – अब इस नब्बे पार की उम्र में अकेलापन महसूस करते हैं आप? और तपाक से जवाब आया – कैसा अकेलापन? अकेले होने का मौका कहाँ है पण्डितजी? और अकेले होना किसको है? देख तो रहे हैं पूरा गाँव है…हरदम साथ होता है – गाने से रोने तक…। मैं गदगद, लेकिन अवाक् भी कि अब क्या करूं – जनार्दनजी तो गँवईं अन्दाज़ में सबकुछ थोडे में सीधे समेटे दे रहे हैं…, जबकि हमेशा सभाओं-बैठकों…आदि में रहने के हवाले से यही पूछने पर नामवरजी ने हसरत भरी आह-सी भरते हुए कहा – ‘बहु…त मिस करता हूँ’… और उसी सभाओं…आदि को ही अपना सामाजिक जीवन एवं उसी के प्रमाण से अपने को बहिर्मुखी बताया। फिर लगभग दस मिनटों तक अपनी देश-विदेश की यात्राओं को बखानते रहे, जिसमें ख़ास ज़ोर हवाई से रेलिया बैरन तक की घुमक्कडी व फोटो …आदि की मुफ्तखोरी पर था…। और इसी की निरंतरता में अपनी चर्या बताने लगे थे, जिसमें पढने-लिखने की बात के साथ अपनी बहुत बडी लाइब्रेरी का हवाला देते हुए ख़ास उल्लेख 100 से अधिक अपनी लिखी किताबों का किया – बिना पूछे…।

अभी कल तक तो अपने क़द से बहुत कम लिखने के हीनभाव के उदात्तीकरण में ख़ुद को वाचिक परम्परा का शीर्ष आचार्य सिद्ध करते अघाते न थे…अब आचार्य शुक्ल जी की बराबरी करने की महत्त्वाकांक्षा में कई खण्डों में हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने का मंसूबा बता रहे,  भविष्य में अपने को आलोचना के सम्पादक के रूप में जाने जाने की बात ख़ुद ही करके स्वयं को महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकक्ष रखे जाने का शगूफ़ा उछाल रहे…। पहले भी कभी उपन्यास-समीक्षा पर ‘न भूतो, न भविष्यति’ वाला ग्रंथ रचने की उद्घोषणा करते… लेकिन अपने सामाजिक जीवन व बहिर्मुखी व्यक्तित्त्व से भरमाये सभा-बैठकों की गवनई से स्वयं को रोक न पाये कभी…!! और अब जब लिख पाने की सम्भावना खत्म हो गयी, तो सौ से अधिक किताबों का काल्पनिक ढूह खडा कर रहे हैं… क्योंकि यदि सब जुहा दी जायें, तो नामवर-लिखित किताबें दर्ज़न भर से अधिक न होंगी। और जो उनके कहे-बोले को पद-धन-लाभ के लोभ से लोगों ने खतिया लिया-दिया है, जिसमें सबसे उद्भट मुनीमी वाले वो चार मोटे-मोटे बहीखाते भी हैं, जिनमें उनके खाँसे-थूके-छींके…आदि को भी ‘नामवर’ करते हुए टाँक दिया गया है…, उन सबको मिला दें, तो शायद दो दर्ज़न हो जायें…। पर इस बिसात को पाँच गुना से अधिक बताने के मामले में भी नब्बे पार का यह ‘नायक अलबेला’ ही है…।

और वहीं जनार्दनजी का देखें कि नरेन्द्र के संग्रहीत दस हजार बघेली लोकगीतों के संग्रह (‘संगीत नाटक अकादमी से शीघ्र प्रकाश्य) में 800 से अधिक गीत अकेले बब्बा ने लिखाये हैं, लेकिन जनार्दन बब्बा से पूछा, तो बोले – अरे इतने नहीं होंगे पंडितजी…नरेन्द्र तो अपना बच्चा है। बोल दे रहा है…’। यही है भारतीय संस्कृति – कालिदास के ‘क्व चाल्प विषया मति:’ और तुलसी के ‘कवित विवेक एक नहिं मोरे’ वाली संस्कृति, जहाँ बखान दूसरे करते हैं। वह शख़्स बिना पूछे ही ‘सौ से अधिक किताबों’ की तरह ख़ुद नहीं बताता कि इतने गीत याद हैं…। लेकिन ऐसे नामवरों के बारे में भी तुलसी ने ही लिखा है – ‘अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी, बार अनेक भाँति बहु बरनी’, पर बेचारे बाबा तो ‘बरनी को करनी’ तक बता पाये। उन्हें क्या पता था कि आज के नामवर लोग तो ‘अकरनी’ को भी ‘भाँति बहु बरनी’ कर डालेंगे और अमितेश जैसे अनाडी लोग सुनके तथा आभा जैसे लोग नोट लेकर चले आयेंगे!! और अनाडी वाक्य रचना में अमितेश का एक मौजूँ प्रश्न – ‘हमारे यहाँ हिन्दी में बुज़ुर्ग को ‘लोग छोड देता है’…ऐसा आप भी मानते हैं’? उत्तर में सादगी के साथ नामवर उवाच – ‘यह तो सही है’ और फिर ‘सन्यास आश्रम’ युग का हवाला देते हुए तब के लोगों की समझदारी को सराहा कि जिस घर में सम्मान से रहे, वहाँ अपमानित होने से अच्छा है – बाहर निकल जाना…। आश्रम धर्म की यह अभिनव व्याख्या भी सितारा समीक्षक (स्टार क्रिटिक) ही कर सकता है…!!!

इस ‘अलबेले नायक’ को आज भी ‘बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी, गंगा-स्नान’…आदि याद आता है। काशी की अनुरक्ति (पैशन) में छोटे भाई का नाम ‘काशी’ रखा…। चुनने को कहा जाये, तो आज भी दिल्ली नहीं, काशी चुनेंगे…। परंतु यह पूछने का जुर्म कौन करे कि ऐसा था, तो काशी ने बीएचयू में अध्यापन की टॉप नौकरी दी थी, फिर किन मोहों में छोडा गया…?? फिर किन आकर्षणों में कभी बहुरा न जा सका…? आज भी ‘एक बार काशी देखने की बडी इच्छा है, कह नहीं सकता – पूरी होगी या नहीं…’ जबकि हालात तो सर्वविदित हैं कि सर्वविदित हैं कि सगे भाई बीएचयू से सेवामुक्त होकर उत्तम इलाके के अपने बँगले में रहते हैं, सगा भतीजा और सगे भाई की पुत्रवधू उसी बीएचयू में प्रोफेसर हैं, अपने बेटी-बेटा लाखों में कमा रहे और ख़ुद की पेंशन है…याने चार्टर्ड विमान से जितनी बार चाहें आ सकने, रह सकने की मुक्त स्थिति है। तो फिर यह दयनीयता है या ‘बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब, कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है’…!! शायद पर्दा कभी उठे… इशारा तो ‘भाई काशीनाथ’ दशक भर पहले कर चुके तो हैं…। इसके समानांतर कितनी सादी और खुली जिन्दगी की सीधी बात जनार्दनजी ने निठुरे मने बडी शान से कह दी – उनका तो काशी और मक्का…सब यही लकोडा है। बेटी ससुराल (कानपुर) में अकेली (बिना देवरानी-जेठानी के) होने से व्यस्त है – साल-दो साल में किसी मौके पर आती है। बेटा सिगरौली इलाके में ठीकेदारी का काम करता है। बहू-पोते अक्सर आ जाते थे, पर दुर्दैव से पिछले सालों में बहू नहीं रही, विवाहित पोती चल बसी… दुखी बेटा इधर साल भर से नहीं आया। पत्नी भी दुखी और रोगी होकर चलने-फिरने में अशक्त हो गयी हैं। खुद ही खेती-बारी से लेकर खाना-पीना बनाने, पत्नी की देखभाल करने का सारा काम देखते हैं और समय निकाल कर बेटे के पास हो आते हैं… और हारे-गार्हे में पूरा गाँव साथ रहता है… ‘मैं तो लकोडा के बिना कहीं और जी तो क्या, मर भी नहीं सकता पण्डितजी… हाँ, कोई पूछे, तो फिर ज़रूर यहीं पैदा होना चाहूँगा…’। आगे के लिए मुझे महादेवीजी के ‘ठकुरी बाबा’ याद आ गये – ‘सरग हमका ना चाही, मुदा हम दूसर नवा सरीर माँगे बदे जाब जरूर। ई ससुर तो बनाय कै जरजर हुइगा’।

जनार्दनजी का यह पूरा सम्भार देखकर मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का ‘कुटज’ बेसाख़्ता याद आ रहा है – “ये ठिगने-से, लेकिन शानदार दरख़्त गर्मी की मार खा-खाकर, भूख-प्यास की निरंतर चोट सह-सह कर जी रहे हैं – सिर्फ़ जी ही नहीं रहे, हँस-गा भी रहे हैं।… मस्तमौला हैं ये। इनकी जडें काफी गहरे पैठी रहती हैं…। वे पहाड की छाती फाडकर न जाने किस अतल गह्वर से अपना भोज्य खींच लाते हैं…!!” जनार्दनजी की जडें हमारे लोकजीवन में जमी हैं। अभिजन इसे सुखाकर ही ‘शिष्ट’ बनते हैं। यही लोक की जड नब्बे पार तक इतनी पारिवारिक विपत्तियों व खेती के कठिन कामों के बीच भी सूखती नहीं, उस रस को बनाये हुए है – गाती-बजाती-हँसती-हँसाती रहती हैं। और उस सच से रोज़ दो-चार होती रहती हैं, जिसे जनार्दनजी ने घर बैठे बात-बात में हँसते-हँसते गाके सुना दिया –

एक दिना ससुरे जाये का परी, जायके यमराज से बताय के परी।

चारि जने मिलि डोलिया उठइहैं, औ घाटै घाट नहाये के परी…। 

और पण्डितजी की ही व्याख्या में ये शिवालिक निवासी…शिवालिक या ‘शिवालक…शिव की जटाजूट ही इतनी सूखी, कठोर हो सकती है’ और उलझी भी…। तभी वे बोलते कुछ और हैं और करनी कुछ और कहती है। यहाँ सन्दर्भित दोनो साक्षात्कारों (यूँ तो बहुत हैं) में आयी हक़ीकतें कह दे रही हैं कि जीवन इनकी धज्जियां उडा चुका है – कबीर के माफ़िक – ‘माटी कहे कुम्हार से तू का रूँदे मोहिं, एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रूदूँगी तोहिं’। इतनी बडी देसी-बिदेसी दुनिया और बेटे-बेटी के दिल्ली में ही रहते यह एकाकीपन…!! शायद इस चरम शिष्टता में परिवार के साथ होना ‘परनिर्भर होना’ होता हो…। जिस प्रिय बनारस की धज्जियां उडाकर छोड गये थे, आज उसी को देखने की तडप…!! यह सब उनकी ज़ुबानी पढकर हिन्दीतर वृहत्तर समाज क्या सोचेगा इतनी बडी हिन्दी भाषा के तथाकथित शीर्ष आलोचक और इसके बरक्स इस भाषा और साहित्य के स्तर पर…? और युनिवर्सिटियों में भरी गयी सडाँधों पर तो साक्षात्कार होते ही नहीं…!!

अंत में अपने चैनल के लिए सेल्समैन की भाषा में कहा भले गया कि ‘फिर कभी कोई दूसरा नामवर नहीं होगा’…,पर कभी कोई दूसरा किसी पहले जैसा नहीं होता। फिर दूसरे नामवर न हों, तो क्या होगा? जब ‘छायावाद’ और थोडा-सा ‘दूसरी परम्परा की खोज’ के सिवा नब्बे से अधिक सालों में कुछ दिया नहीं – सिर्फ़ शगूफे छोड-छोड के, ‘वाद, विवाद, संवाद’ लिख-लिख के और मंचों-साक्षात्कारों में विवाद फैला-फैला के कमाया नाम-दाम, जिससे बनी ‘पॉप्युलैरिटी’ को भुनाने जाता है चैनल भी, वरना 90 पार के बडे रचनाकार रामदरश मिश्र या अभी हाल में आकर बहुत देर से ‘मिथक सरित्सागर’ जैसी साधनापरक रचना के लिए ‘साहित्य अकादमी’ से पुरस्कृत अस्सी पार के रमेशकुंतल मेघ….आदि के पास भी क्यों नहीं जाता?

मैं यह जरूर कह सकता हूँ कि जनार्दन से मिलना सौभाग्य था मेरा…पूरे गाँव के साथ मिलकर जनार्दनजी ने अनायास जो लकोडा बनाया है, यह नस्ल (ब्रीड) भी अब लुप्तप्राय हो रही है। मिल लें ऐसे जनार्दनों से, जहाँ मिलें… ऐसे जनार्दन फिर हों, न हों…!!

‘फूल गमले में होते अवश्य हैं, पर कुटज तो जंगल का सैलानी है, उसे गमले से क्या लेना-देना’?

(यह लेख मशहूर हिंदी साहित्कार और फिल्म समीक्षक सत्यदेव त्रिपाठी से साभार लिया गया है।)


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