नीरव मोदी वाले PNB और लाल बहादुर शास्त्री के PNB में फर्क तो है…एक बार की बात है…

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भरोसा कहीं भी मिल सकता है और कहीं भी टूट सकता है। भरोसा बिन आधार कार्ड के देश के किसी भी कोने में रहता हुआ मिल जाएगा। हालांकि कई बार ये आधार मांगने के लिए हमेशा फोन करने वाली संस्थाओं में भी ढूंढ़े भी नहीं मिलेगा। भरोसा पंजाब नेशनल बैंक में भी फिलहाल तलाशने से भी नहीं मिल रहा है।

बात जब पंजाब नेशनल बैंक और उससे लोन लेकर गायब हुए एक शख्स की हो रही हो तो इसी बैंक से जुड़ा एक वाक्या कई लोगों को याद आ रहा है। एक बार की बात है। इस देश में एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे लाल बहादुर शास्त्री। इन पंक्तियों को जिस तंज के साथ लिखा जा रहा है कि उसी तल्खी और व्यंग्य के साथ समझना जरूरी है। तो एक बार फिर से, एक बार की बात है…देश में एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे लाल बहादुर शास्त्री। लाल बहादुर शास्त्री के परिवार को कहीं आने जाने के लिए कोई वाहन की सुविधा नहीं थी। लाल बहादुर जी सिद्धांतों के खासे पक्के थे लिहाजा परिवार के लोगों को सरकारी गाड़ी के इस्तमाल की इजाजत नहीं थी।

car of lal bahadur shashtri


वाहन की जरूरत को देखते हुए शास्त्री जी के परिवार ने एक कार खरीदने की सोची। कार की कीमत पता लगाई गई जो उस समय तकरीबन 12 हजार रुपए थी। शास्त्री जी के खाते में कुल सात हजार रुपए थे। शास्त्री जी ने अपने सहयोगी को बुलाया और बैंक से कार खरीदने के लिए पांच हजार रुपए लोन की प्रक्रिया पूरी करवाने को कहा। चूंकि लोन एक पीएम को होना था लिहाजा एक दो दिन में ही लोन पास हो गया। अब लगे हाथ ये भी जान लीजिए कि वो बैंक कौन सा था जिसने शास्त्री जी का लोन पास किया। जी, वो बैंक यही वाला पंजाब नेशनल बैंक है जिसकी आज हर तरह चर्चा है। खैर, उस पुरानी दास्तान पर लौट आइए। लोन एक दो दिन में पास होने पर शास्त्री जी खुश हुए। उन्होंने कार लेने से पहले बैंक के अधिकारियों को संदेश भिजवाया कि जितनी आसानी से एक प्रधानमंत्री को लोन मिल गया उतनी ही आसान प्रक्रिया देश के हर आम आदमी के लिए भी अपनाई जाए।

पांच हजार का लोन लेने के बाद शास्त्री जी ने फिएट कंपनी की कार खरीदी जिसकी कीमत 12 हजार रुपए थी। नंबर मिला DLE 6. दुखद ये हुआ कि लोन लेने के कुछ ही दिनों बाद शास्त्री जी की ताशकंद में मृत्यु हो गई। अब क्या हो? बैंक का लोन कैसे चुकाया जाए? बैंक को अपने दिए लोन की चिंता थी सो शास्त्री जी के घर एक चिट्ठी भेजी। चिट्ठी शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री को मिली। ललिता जी ने बैंक को आश्वस्त किया कि बैंक का लोन चुकता किया जाएगा। ललिता जी ने पेंशन से मिलने वाली रकम से बैंक का लोन चुकाया।

शास्त्री जी ने जो कार खरीदी थी उसे अगर आप ईमानदारी की मिसाल के तौर पर देखना चाहें तो शास्त्री जी की याद में बने संग्रहालय में इसे आज भी देख सकते हैं। बाकी बेईमानी की मिसालें तो आजकल हर ओर मिल जाएंगी।


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