कला आंदोलन का नया स्वरूप है सीधी का लोक रंग महोत्सव

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seedhi rang mahotsav

सीधी (सिद्धगिरि) में रंगकर्म की अनगूँज तो सुनायी पडी थी, पर देखने के पहले तक उम्मीद न थी कि वहाँ रोशनी के साथ नीरज कुन्देर और नरेन्द्र बहादुर सिंह के जुनूनेफ़न में ज़मीन से जुडा हुआ इतना अच्छा रंगकर्म हो रहा है। और रंगकर्म ही नहीं, उस अंचल की सारी लोक कलाओं का मौलिक और भव्य प्रदर्शन हो रहा है, जो अपने प्रभाव व परिणति में एक सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप ले चुका है। वहाँ है भी अपार लोक समृद्धि, जो शुक्र है कि अब तक बची और जीवंत भी बनी रह गयी, लेकिन यूँ तो धीरे-धीरे छीज व सूख ही जाती…। लेकिन अब ‘इन्द्रवती नाट्य समिति’ के दिली व सुनियोजित प्रयत्नों तथा इसकी व्यवस्था में सीधी के ‘जिला-प्रशासन’ (बरवक्त के जिलाधीश श्री दिलीपकुमार) की सक्रियता के चलते इसका भविष्य उज्ज्वल है। वहाँ के मौजूदा विधायक श्री केदारनाथ शुक्ल तो आयोजन के परिकल्पक रूप में नामज़द हैं, पर आम नेताओं से बिल्कुल अलग ही कार्यक्रम के हर रूप व हर मौके पर पूरे समय शरीक व सक्रिय भी रहे…। यदि सबकुछ ऐसे ही चलता रहा, तो आने वाले समय में देश के एक बहुत बडे सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में रोशन होगा ‘सीधी’ और ख़ुदा करे, ऐसा हो…।

कार्यक्रम की शुरुआत 27 जनवरी की सुबह सभी लोक कलाकारों और आमंत्रित अतिथियों की सहभागिता में ‘स्वच्छता-रैली’ से हुई और इसी की संगति में 29 जनवरी को समापन-रैली के साथ आयोजन का सम्पन्न होना एक अनोखी ही उद्भावना का सिला सिद्ध हुआ।

 इसके अलावा पूरा आयोजन तीन भागों में विभक्त रहा। रोज़ ही दोपहर 12 से 2 बजे तक लोक वार्ता, सायं 5 से 7 बजे तक लोकरंग और 7.30 से 9.00 बजे तक नाट्य-मंचन। लोकवार्त्ता व नाट्यमंचन तो ‘मानस भवन’ में होते और उसी के सामने स्थित पूजा पार्क में ‘लोकरंग’ की प्रस्तुतियां होतीं। कहना होगा कि पूजा पार्क में तो हजारों की संख्या में आये लोग शामियाने के बाहर भी खडे होकर गीत-नृत्य देख-सुन लेते, पर ‘मानसभवन’ तो पहली शाम नाट्य-प्रदर्शन के वक़्त यूँ खचाखच भर गया कि दूसरी-तीसरी शामों को अधिक लोगों को समा पाने की ग़रज़ से कुर्सियां हटाकर ज़मीन पर बैठने की व्यवस्था की गयी, पर पूरी न पडी…। नाटक खेलने की किसी सुविधा के बिना भी पांडाल में सफलता पूर्वक नाटक खेल लेना साधनों से अधिक साधना का मामला सिद्ध हुआ…। लेकिन सुखद रहा कि जिलाधीश ने आख़िरी शाम घोषणा करायी कि अगले उत्सव तक ‘सीधी’ में नाटक करने के सर्वथा लायक एक नहीं, दो-दो हॉल तैयार रहेंगे…। हमारी शुभेच्छा है कि वादा सरकारी ही सही, पूरा भी हो…।

‘लोकवार्त्ता’ से ही आयोजन का शुभारम्भ हुआ, जब बाहर से आमंत्रित सभी कला-मर्मज्ञ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन से लोकोत्सव के उद्घाटन के बाद ‘इन्द्रवती’ संस्था की तरफ से सबका स्वागत हुआ। और शाम को ‘लोकरंग’ में जिला प्रशासन की तरफ से पुन: स्वागत किया गया। ‘लोकवार्त्ता’ का आयोजन देखने से लगा कि संकल्पना खुली बातचीत की थी और लोक संस्कृति पर आधारित विषय भी बहुत मौजूँ रहे, पर न ही पूछने वाले सवालों की वैसी तैयारी से आये और न ही आमंत्रित विद्वान ही प्रश्नोत्तर के लिए सही ढंग से तैयार थे। अत: पूछने वाले के हाथ में माइक के साथ बातचीत का विधान बना रहा और भाषण होते रहे…। तीनो दिन के संचालक रहे क्रमश: मनोज पाण्डेय, अमित मिश्र और अखिलेश पाण्डेय।

पहले दिन की वार्त्ता का विषय था – ‘लोक संस्कृति और सरकारी नीतियां’, जिस पर शैलेन्द्र पाण्डेय (पटना) ने अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां न बन पाने का मलाल ज़ाहिर किया, तो वरिष्ठ चिंतक और मुख्य वक्ता श्री वसंत निरगुने (भोपाल) ने सरकार को निमित्त मात्र बताया और सारा दारोमदार समाज के सर रखते हुए सीधी आयोजकों की खूब तारीफ़ें कीं। उनके वक्तव्य पर सरकारी सहायता से कलाकारों के सम्पन्न होने की बावत सवाल-जवाब में अच्छी चर्चा भी हुई। लेकिन विषय के बारे में कुछ न कहने की सादगी के बावजूद सिर्फ़ इस सत्र की ही नहीं, पूरे आयोजन की महफिल लुट गयी सिनेमा के सुरेन्द्र राजन पर। मंच माध्यम पर पर्दा माध्यम की यह चकाचौंध भी ध्यातव्य रही।

दूसरे दिन का विषय था – लोक संस्कृति और बाज़ारवाद। मनोज मिश्र (रींवा), सुभाष मिश्र (सीधी), प्रवीण गुंजन (बेगुसराय) …आदि सभी वक्ता बाज़ार के गहरे असर से लोकसंस्कृति के क्षय की बात पर अपनी-अपनी तरह एकमत रहे और बची-खुची के व्यावसायिक होने के ख़तरे में प्रबन्धन की भूमिका का ख़ास उल्लेख भी आया। समाहार करते हुए सत्यदेव त्रिपाठी (वाराणसी) ने लोक संस्कृति की सामूहिकता और आवेगमयता की पहचान के साथ गालिब आदि के उदाहरण से हर युग में बाज़ार के होने का जिक्र करते हुए लोक कलाओं के क्षय में बाज़ार के साथ विज्ञान और तकनीक के हवाले से अपनी बात रखी और बेजोड कलात्मक सरोकार वाले मोर के उदाहरण से बाज़ार के प्रतिरोध और ऐसे प्रयत्न में ‘सीधी लोकोत्सव’ जैसे आयोजन में निहित सम्भावना को भी उजागर किया। श्रोताओं के कतिपय सवालों पर मंच के जवाबों के बाद अध्यक्षीय वक्तव्य में विधायक श्री केदारनाथ शुक्ल ने वक्ताओं को सरस्वती के वरद पुत्र के रूप में श्रेय तो दिया, लेकिन साथ ही साफ-साफ तौर पर उन्हें (अपने) प्रबन्धन पर आश्रित बताया।

तीसरे दिन की चर्चा की शुरुआत वरिष्ठ रंग समीक्षक एवं कथाकार-नाटककार हृषिकेश सुलभ ने विधायक के उक्त वक्तव्य के कडे प्रतिरोध से की और कहा कि विचारक व कलावंत किसी राजनीतिक या प्रशासनिक प्रबन्धन का मोहताज़ नहीं होता। फिर लोकवार्त्ता के विषय ‘लोक संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन में समाज की भूमिका’ पर उन्होंने ‘विवेक’ को कसौटी माना, जो पूरे सत्र की चर्चा की कुंजी बन गया। संतोष द्विवेदी (उमरिया), आशीष पाठक (जबलपुर) ने इसे अपने-अपने कामों व विचारों के अनुसार सिद्ध किया। श्रोता-संवाद में संरक्षण व संवर्धन की ज़रूरत खुलकर स्थापित हो सकी।

शाम की शुरुआतें ‘लोकरंग’ के अंतर्गत लोकगीत-नृत्यों से होती थीं। पहले दिन मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय, भोपाल के निदेशक संजय उपाध्याय, जिनका सीधी की लोककला प्रस्तुतियों में मार्गदर्शक के रूप में और ख़ासकर नाटकों को रूपाकार देने में बेहद कारग़र योगदान की चर्चा हर ज़ुबान पे है, के उद्घाटन वक्तव्य से हुई। इसके बाद गीत-नृत्य का जो मनोरंजक सिलसिला शुरू हुआ और तीन दिनों तक चलता रहा, उसकी जितनी सराहना की जाये, कम है। मनबिसरा कोल लकोडा द्वारा फाग व भगत, राजभान साहू रामपुर के दल द्वारा अहिराई नृत्य, नन्हें घासी के दल द्वारा गुदुम्ब नृत्य, रावेन्द्र सिंह बकवा के समूह द्वारा शैला नृत्य, रामावतार मिश्र व समूह द्वारा रामचरित मानस का गायन, अविनाश तिवारी व समूह द्वारा रामलीला पात्र अभिनय, रामदास यादव व समूह द्वारा अहिराई लाठी, बाल कलाकार मान्या पाण्डेय एवं हरिश्चन्द्र मिश्र द्वारा संस्कार गीत, दुलारे घासिल व समूह द्वारा कर्मा लोकनृत्य… आदि विविध रूपरंगी प्रस्तुतियों ने समाँ बाँध दिया… ऐसा माहौल आज कहीं विरले ही देखने को मिल सकेगा …काश इनके सोदाहरण उल्लेख कर पाता…!!

तीनो दिन के लोकोत्सव का विराम नाट्य मंचन से होता रहा। तीनो नाटक नरकासुर, चिरकुमारी और एकलव्य तीनो प्रमुख आयोजकों क्रमश: नीरज कुन्देर, रोशनी प्रसाद मिश्र और नरेन्द्र बहादुर सिंह के निर्देशन में खेले गये। तीनो ही बेशक़ अपनी लोकभाषा बघेली (जो बिल्कुल अवधी-भोजपुरी जैसी ही है) में तो थे ही, सबके प्रमुख स्वर और शायद मूल प्रेरणा व अंतरिम उद्देश्य भी अपने अंचल के ऐतिहासिक, पौराणिक व लोकविश्रुत कथाओं के बहाने अपनी बघेली लोक-विरासत से सम्पन्न संस्कृति को साकार करना ही है। प्रकृति का मानवीयकरण तो साहित्य व कला का विश्रुत आयाम है, पर इन नाटकों में विरल व ख़ास है मानव का प्रकृतिकरण। नर्मदा-शोणभद्र जैसी नदियां ‘चिरकुमारी’ में प्रमुख पात्र बन जाती हैं और ‘नरकासुर’ में उसके रक्त से ‘नरकुईं’ नदी के उद्गम की कथा भी पिरोयी गयी है, जिसे सवर्णों द्वारा अछूत माना जाता रहा है।

सभी में भिन्न-भिन्न किस्म के सूत्रधार हैं, जो संस्कृति के अतीत से निकले हैं और आपको अपनी उँगली पकडाये उस अनिश्चित, पर सहज विश्वसनीय काल में ले जाते हैं, जिसमें से एक-एक पुराण-पात्र आप से रू-ब-रू होते हैं, उनकी घटनाएं नुमायां होने लगती हैं और आप एक दूसरी दुनिया में चले जाते हैं, जहाँ सबकुछ गीत-नृत्यमय है, खिलन्दडेपन से सराबोर है, सामूहिक और सहज है। चमत्कृत करता है, पर अपना-सा लगता है। मुम्बई में रंग-रोगन से सजे-धजे ड्राइंग-बेड रूम्स में चलती अंतहीन बातें व छद्मभरी हरकतें देख-देख कर सिठाये हुए मुझे तो ये सारे कौतूहल बेहद नाट्यमय व खाँटी लगे – मरुथल में शीतल फुहार जैसे।

किंतु विश्रुत पौराणिकता में कतिपय बदलाव सवालिया भी लगे। ‘एकलव्य’ की हुनर व हुकूमत की जंग में सत्तापक्ष की क्रूरता को बढा-चढाकर दिखाने की रौ में द्रोण व शिष्यों द्वारा जबर्दस्ती अंगूठा कटवा देने में वनवासी बच्चे के गुरु-भक्तिभाव की लोकचेतना जाती रहती है। उसे दौपदी-स्वयंवर में कृष्ण द्वारा मरवाने के बदलाव से भी कथ्य की कोई बात बनती नहीं। इसी तरह ‘नरकासुर’ में 1600 स्त्रियों के अपहरण पर ऐसी सामाजिक चेतना के अवसर थे, जिसमें आज के महात्माओं की छबि भी बिम्बित हो सकती थी, पर आंचलिक लोक-छबि को उभारने में बात छन जाती है। ‘चिरकुमारी’ में कथा और नाट्य का सबकुछ हो जाने के बाद अमृतलाल बेगड को लाकर बडी उपयोगी बातें कराना भी नाट्य नहीं हो पाता। इसे मूल संरचना में पिरोना ही मंच-कला की सार्थकता होगी। बावजूद इसके इन सबकी कीमत पर बघेली लोक की मान्यतायें व संस्कृति को जीवंत करना भी कम मुफीद नहीं ठहरता।

ऐसे तो लोक कला की फ़ितरत ही सामूहिक है, जिसमें सभी कलाकार एक नाटक की क़ुदरत व ज़रूरत के मुताबिक भिन्न-भिन्न नाम-रूप धरकर प्रस्तुतियों को समृद्ध व जीवंत करते हैं, पर नरकासुर और एकलव्य की दोनो मुख्य भूमिकाओं में शिवकुमार कुन्देर की समर्थ छबि छिप नहीं पाती। एकता सिंह परिहार और सुनैना भी दो-दो नाटकों में आकर अपनी शिनाख़्त करा ही लेती हैं। छोटी भूमिकाओं में भी समूह के बडे कलाकार अपनी अलग पहचान करा लेते हैं, जो नयों के लिए प्रेरणा के रूप में भी अनुकरणीय होगा। सीधी क्या, मध्यप्रदेश से इतर महाराष्ट्र-उत्तरप्रदेश …आदि प्रांतों के कलाकर बघेली भाषा व संस्कार में रचे-बसे होकर आह्लादित कर देते हैं।

सबकुछ के अंत में ‘एकलव्य’ के शो के बाद जब नीरज ने नितांत अनौपचारिक रूप से उत्सव के एक-एक भागीदार व साक्षियों को मिलाकर लगभग सौ लोगों को मंच पर इकट्ठा करके सबका सहज इस्तक़बाल किया, तो जो समाँ बँधा, वह विरल रूप से चिरकाल के लिए स्मृति में सँजो उठा है…।

प्रसिद्ध साहित्यकार सत्यदेव त्रिपाठी की कलम से