जले जिस्मों की आंच में संस्कृति और सिनेमा

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सत्यदेव त्रिपाठी। संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ पर्दे पर आने के पहले ही इतनी बेपर्द हुई कि अंत में एक दिसम्बर के रिलीज़ पर रोक ही लग गयी…! पूरे प्रकरण पर मीडिया में इतने पृष्ठ रंगाये और इतने लोगों ने बयान-मंतव्य दिये, जिसका हिसाब भी मुश्किल है. पर अब क्या कह-कर दें कि रिलीज़ रुक जाये और क्या कर दें कि रिलीज़ हो जाये… की रस्साकशी जब थम गयी है, तो इस अफरा-तफरी से अलग कुछ खरी-खरी व लब्बो-लुबाब बातें की जा सकती हैं. जो कला और समाज की दृष्टि से ज़रूरी हैं…

सारे विवाद की जड़ और प्रमुख बात है- पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के सम्बन्धों के अंतरंग दृश्यों की. जिसके लिए भंसाली की तरफ से बयान आते रहे कि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन अलाउद्दीन के रूप में अपने चुने जाने की चर्चा या प्रस्ताव के समय अभिनेता रणवीर सिंह ने बयान दिया था कि कम से कम दो ‘इन्टीमेट सीन’ होने चाहिए दीपिका के साथ, तभी वे यह भूमिका करेंगे. तब तो इस बयान का खण्डन करने के बदले संजय ने भी खिलजी-पद्मिनी के रोमांस-गीत फिल्माने का ऐलान कर दिया था. तो, असल में इधर आके जो आग धधकी, उसकी तीली तभी लग गयी थी…

जैसा कि हर बात को लेकर होता है, अब इस बात को लेकर भी बहस व तर्कों की इतनी शाख़ाएं फूट गयीं, जिसमें यह मूल बात ही नदारद होती गयी. पद्मिनी-खिलजी के अपेक्षित अंतरंग दृश्यों के लिए वक्तव्यों में ‘इतिहास से छेड-छाड़’ जैसा दर्ज़ेदार जुमला सामने आया और बहस शुरू हो गयी कि पद्मिनी का कथा इतिहास है क्या? फिर ‘इतिहास के साथ कलात्मक छूट (लिबर्टी)’ की दूसरी बहस जुड़ गयी, जो है तो सनातन, पर आजतक इसकी कोई सीमा तय नहीं हो पायी– हो सकती भी नहीं.

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खिलजी-पद्मिनी के ऐसे दृश्य को साकार करने में फिल्म वालों की तरफ से खिलजी के सपने की आड़ को सबसे बड़े अस्त्र के रूप में पेश किया गया. जो असल में फिल्म-विधा की प्रदर्शनपरक ताकत का सीधे-सीधे बेज़ा इस्तेमाल है. इसे साबित करने के लिए बतौर उदाहरण ऐतिहासिक सत्य और कलात्मक छूट के दोनों मुद्दों को एक साथ मिलाकर यूं समझा जाये कि क्या वाल्मीकि व तुलसी के रामायण इतिहास हैं? और इनके साथ कलात्मक छूट के नाम पर कोई भंसाली दिखा-फिल्मा दें रावण के सपने में सीता के साथ उसके अंतरंग दृश्य… तो क्या उसे सही मान लिया जायेगा, चला लिया जायेगा?

और रही इतिहास की सच्चाई की बात, तो जितने लोग रामायण या पद्मिनी के जौहर की कथा जानते हैं, राम के होने की तरह इस पर भी अखण्ड विश्वास करते हैं, उतने लोग इतिहास जानते हैं क्या? उस पर उसी तरह विश्वास करते हैं क्या? टैगोर जी ने इस बाबत क्या ही सुन्दर सत्य उद्धृत किया है कि नारद ने वाल्मीकि से कहा –‘सेई सत्य जा रचिबे तुमि. घटे जा ता, सब सत्य नहे, कवि तव मनोभूमि. रामेर जनम स्थान अयोध्या, चेये सत्य जानो’. यानी इतिहास के सत्य से वह सच बड़ा है, जो जनमानस में पैठ गया है– चाहे भले वह साहित्य का हो या लोक साहित्य का… यदि वह जीवन में संस्कार व संस्कृति बनकर घुलमिल गया है. मूल्य बनकर जीवन व समाज को दिशा दे रहा है. विश्वास बनकर जीवन का रहबर हो गया है. और समर्थ है बनाने में एक बेहतर समाज. कला, साहित्य एवं शिक्षा का मूल उद्देश्य यही है.

क्या खिलजी-पद्मिनी के सम्बन्ध वाले दृश्य ऐसा कर पायेंगे या वे रूमान के नाम पर उन मूल्यों को नष्ट-भ्रष्ट ही करेंगे…? अब कहने वाले यह भी कह देंगे कि सीता से पद्मिनी की तुलना क्यों? तो पद्मिनी क्या, कोई सामान्य स्त्री ही क्यों न हो, उसकी मर्ज़ी के बिना ऐसा होना कितना गलत है, यह ‘पिंक’ फिल्म के बाद तो बताने की ज़रूरत नहीं ही बची है. और मर्ज़ी एवं मर्यादा के खिलाफ कुछ हो, से बचने के लिए ही पद्मिनी आत्मदाह कर लेती है. वही उसकी पहचान व इयता-महत्ता है. फिर कला के नाम पर वही करा दिया जाये, तो उस कहानी का हासिल क्या, उसमें बचता क्या है? वही राख हाथ लगेगी, जिसका जायसी जी ने दोहरा इस्तेमाल किया– ख़िलजी के लिए राख और स्त्री-अस्मिता के लिए उसी को ज्वाला बना दिया, जिसे आज वृहत्तर सन्दर्भों में व्याख्यायित किया जा सकता है. लेकिन यदि इस पर दृश्य फिल्माया गया, तो यह उस अस्मिता को भस्म करना होगा और करनी सेना भी इसे ‘राजपूती शान’ मात्र के सीमित दायरे में सिमटाने पर तुली है!!

असल में रणवीर जब अंतरंग दृश्य फिल्माने का बयान दे रहे थे, उन्हें ख़्याल तक न रहा होगा कि यह असल में पद्मिनी-खिलजी का साथ होना सिद्ध होगा-  भले कथित रूप से या सच ही, दीपिका उनकी प्रेमिका हों. और ऐसा इस कहानी के लोक या साहित्य के किसी भी संस्करण (वर्ज़न) में कभी नहीं हुआ. इसका भान तब संजय भंसाली साहेब को भी नहीं हुआ था कि यह लीला क्या रंग लायेगी…. ऐसे में लोगों का यह समझना स्वाभाविक ही है कि पर्दे के बाहर के एक आशिक़ की बात को पर्दे के लिए भी निर्देशक ने मान लिया है.

असल में भंसाली के फिल्मों की यह लीला रही है. वे कहानी के साथ ऐसी छेड़-छाड़ करते रहे हैं. ‘देवदास’ में पारो और चन्द्रमुखी को मिला दिया– पारो के घर में ही. ऐसा न उपन्यास में था, न पहले की आयी दोनों फिल्मों में. ऐसा करके वे शायद अपने को बरुआ से बड़ा सर्जक व चिंतक साबित करना चाह रहे हों, जिसकी फिल्म में कला की दृष्टि से कोई ज़रूरत या उपयोगिता ही नहीं है– सिवाय ऐश्वर्या राय व माधुरी दीक्षित पर एक गाना फिल्माकर कुछ अलग उछाल देने और कुछ ज्यादा कमा लेने के…. बंगला-समाज में तब भी बवाल उठा था. यही उन्होंने ‘बाजीराव मस्तानी’ में भी मस्तानी और काशीबाई को साथ में नचा कर किया. उस पर भी कहा-सुनी हुई थी. इस तरह ऐसे विवादों की लीला, संजय भंसाली करते रहे हैं.

स्टार्स के सहनृत्य को भुनाते-भुनाते इसे कमा लेने की लत में भंसाली रोमांटिक दृश्य भी आज़मा सकते हैं- पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी के अंतरंग दृश्य फिल्मा भी सकते हैं… घूमर वाला नृत्य-गीत तो ट्रेलर में धड़ल्ले से आ ही रहा है, जिसके लिए भी सवाल जायज़ ही है कि राजा रत्नसेन अपनी रानी को सरेआम दरबार में नचायेंगे!! और इस घूमर दृश्य करने पर फूले न समाने वाली और अवाम तक पहुंचने के लिए बेताब दीपिका पदुकोण पद्मिनी तो बन ही नहीं पायीं. यदि भंसाली को कोई नयी उद्भावना पेश करनी होती, तो ‘जोधा अकबर’ में जोधा को तलवार चलाने जैसी कोई युक्ति निकालते, जो उस चरित्र पर फिट बैठती, फ़बती. और वह सम्भ्रांत रानी सामने नचाने वाली तो नहीं ही होती…. नाचने के लिए तो जानी भी नहीं जाती पद्मिनी.

तो ये सब फिल्म चलाने व कमाने के हथकण्डे हैं…. और पूरी फिल्म जमात यह सब कुछ न सोचकर एक स्वर से भंसाली के साथ खड़ी है. शबाना तक गोवा के फिल्मोत्सव का बहिष्कार करने की घोषणा कर चुकी हैं और भंसाली को बहुत अच्छा फिल्मकार कहने वाले सलमान तो ख़ैर जिस स्टारडम के लिए जाने जाते हैं, उसमें ऐसी सोचों के लिए अवकाश ही नहीं है. फिर तमाम फिल्म वालों को तो भंसाली की गुड बुक में रहना ही है– बड़े निर्देशक जो ठहरे…. कुछ बुद्धिजीवियों में भी हिकारत का भाव है– जाने दो, सिनेमा वाले हैं, कुछ भी करें– क्या फर्क़ पडता है!! लेकिन बहुत फर्क़ पड़ता है– आख़िर आम आदमी की चहेती लोकप्रिय विधा जो है.

यह सच है कि विरोध पर उतरने वालों का भी सरोकार कला व संस्कृति से उतना नहीं है, जितना अपने दूसरे मक़सदों व मतलबो से हैं. जो फैलते-बढ़ते गये… और इसी के तहत राजनीति से लेकर विभिन्न जमातों व संगठनों वाले लोग विरोध पर उतरते गये– उतरते गये…. और विरोध के लिए तोड़-फोड़ की अराजकता या नाक काटने व तमाचा मारने की हिंसात्मक कार्यवाहियां कतई उचित नहीं, पर इससे बड़ा सच यह भी है कि विरोध पर उतारु लोगों का यह गड्डलिका प्रवाह है. जिसकी सोच-समझ एक स्तर पर जाकर सिर्फ जुनून बन जाती है.

इसके लिए बलपूर्वक दमन के अलावा एक ही रास्ता बचता है कि अपने कृत्य का जायज़ ढंग से पुनर्मूल्यांकन करके उसे समाज व संस्कृति के लिहाज से बदल लिया जाये. वरना भीड़ और कलाचेता में क्या फर्क़ रह जायेगा? लेकिन बदलाव भी ‘रामलीला’ के बदले ‘गोलियों की रासलीला’ जैसा बहकाऊ-कामपटाऊ नहीं, वरन ज़हीन और जायज़ बदलाव… जो जीवन और कला दोनों के लिए सही व सकारात्मक ढंग से उपादेय हों…

 

 

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