सांप्रदायिक आग का कड़वा ‘धुआँ’- सत्यदेव त्रिपाठी

461

पिछले दिनों संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से गुलज़ार साहब की कहानी ‘धुआँ’ का मंचन मुम्बई के ‘जुहू जागृति’ हाल में हुआ। आज और मुम्बई जैसे शहर में कलाकारों की इतनी बड़ी टीम लेकर नाटक कर पाना अपने आप मे एक साहसिक काम  है, फिर जितनी सशक्त कहानी है, उतना ही सशक्त देखने को मिला उसका मंचन…।

यह कहानी साम्प्रदायिकता के जुनून की दिन पर दिन भीषणतर होती जा रही समस्या का घिनौना रूप सामने लाती है। चौधरी रहमत खान पूरे इलाके में हर कौम के मददगार और इसीलिए सबके दिल अजीज थे। मुसलमान होने के बावजूद उन्होंने वसीयत की कि उन्हें दफनाया न जाये – जलाया जाये और उनकी राख को गांव की नदी में प्रवाहित कर दिया जाए, ताकि पानी के साथ उनके अवशेष उन खेतों-सिवानों में मौजूद रहें, जिनसे उनका जिस्म बना था और रूह आबाद थी।

इस वसीयत पर अमल करने का पक्का कौल चौधरी साहब मरते हुए अपनी बीवी से करा गये।
अब शौहर से किये कौल पर दृढ़ है बीवी…। और उसने जब ये बात गाँव को बतायी, तो उनके मौलवी साहेब से लेकर हिंदुओं के पुरोहित…तक सब अवाक!! और चौधरी साहेब के प्रति सारी संवेदना व सम्मान के बावजूद दोनो जमातों की सम्मिलित बैठक में गांव के एक शायर के अलावा सबने यह तय पाया कि ऐसा करने से हिन्दुत्व व इस्लाम दोनो खतरे में पड़ जाएंगे। लिहाजा ऐसी बेज़ा बातें मानी नहीं जा सकतीं…’

IMG-20181128-WA0012

फैसला सुनने के बाद श्रीमती चौधरी ने कोर्ट व पुलिस की मदद से इस काम को अंजाम देने का निर्णय किया…।  लेकिन इसी बीच मुस्लिम जुनूनी घर में घुस आये। शायर ने आके उन्हें रोकना चाहा, तो उसे क़त्ल करके लाश को दफनाने के लिए निकाल ले गये और चौधराइन समेत पूरे घर को बेरहमी से जलाकर खाक कर दिया। इस पर गुलज़ार साहेब लिखते हैं – जिंदा लोग जला दिये गये और मुर्दा दफ्न हो गये।

इस प्रकार धार्मिक संकीर्णता और फैनेटिक अमानवीयता को लेकर  भावनात्मक और वैचारिक स्तर पर झकझोर देने वाले नाटक ‘धुआं’ को मंच पर देखना उस जलजले का साक्षात् सामना करने जैसा सिद्ध हुआ है और इसे खेलना युवा रंगकर्मी निर्देशक विवेक त्रिपाठी की ज़हनियत का प्रमाण है। नाटक मूलतः संवादों पर टिका है, जिसे एक बार खुली पंचायत और शेष को घर के वाजिब दृश्यों में गूंथकर विवेक सही अंजाम दे सके हैं। इसी प्रकार अधिक तामझाम वाले सेट के बिना सिर्फ दो कुर्सी और एक बेड तथा पीछे की छाप से पूरे घर को साकार कर देना भी निर्देशकीय सूझ-बूझ को दर्शाता है। सभी कलाकरों ने अपना चरित्र बख़ूबी निभाया है। सही उच्चारण और लहज़ा इसकी खास विशेषता है, जो हिंदी में आज क्षीण होती जा रही वृत्ति है। मौलवी साहब बने अंश छाबरिया और चौधराइन बनी अर्पिता श्रीवास्तव विशेष ध्यान खींचते हैं। प्रतिमा सिन्हा ने पर्याप्त सरल व सटीक रूपांतर किया है। अभी पहले शो का कच्चापन अवश्य है, पर आगे के शोज़ में अपेक्षित निखार के आसार भी सहेजे है।

सरकारी अनुदान की विरल सार्थकता का प्रमाण भी है ‘धुआँ’।  समय व समाज को आईना दिखाने वाले ऐसे नाटक कलाकर्म ही नहीं, वस्तुत: सामाजिक कर्म भी हैं, जो होते रहने चाहिए…

(यह लेख मशहूर हिंदी साहित्कार और फिल्म समीक्षक सत्यदेव त्रिपाठी से साभार लिया गया है।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here