अगर आपने बनारस की गलियां नहीं देखीं तो जल्दी करिए क्योंकि नरेंद्र मोदी जल्दी में हैं

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जी, सौ फीसदी का निनयानबे भी नहीं। पूरा का पूरा सौ फीसदी। अगर आपने कभी बनारस की गलियों के बारे में सुना है, अपने घर के बड़े बुजुर्गों से इन गलियों की खूबियों को जाना है या फिर गूगल बाबा की मेहरबानी से बनारस के बारे में ज्ञान बटोरा है। तो ये आपके लिए आखिरी मौका है। फिर जबसे नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो उनके प्रयासों से बनारस विश्व प्रसिद्ध भी हो चुका है। ऐसे में लोगों का आना जाना कुछ अधिक हो गया है। ये अलग बात है कि बनारस को दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले से माना जाता है। ये भी अलग बात है कि बनारस के बसे होने के सबूत पांच हजार साल से भी अधिक पुराने हैं। भगवान शिव का त्रिशूल भी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही बना और बनारस त्रिशूल की नोक पर 2014 के बाद ही टिका।

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फिलहाल इस फेर में मत पड़िए कि बनारस कब बसा क्योंकि वो उजड़ने के कगार पर है। गंगा पाथवे के बहाने बनारस के पुराने इलाकों को लगभग खत्म किया जा रहा है। केंद्र सरकार की कोशिश है कि बनारस के गंगा घाट से काशी विश्वनाथ मंदिर तक गंगा पाथवे का निर्माण कराया जाए। इसके लिए रास्ते में आने वाले तकरीबन 150 से अधिक सदियों पुराने घरों और मंदिरों को गिरा दिया जाए। जिस इलाके में गंगा पाथवे के निर्माण का खाका खींचा गया है वो संकरी गलियों में बसा घना इलाका है। बनारस में इसे पक्का महाल का संबोधन दिया जाता है। जो बनारस को महसूस करते हैं वो इन्हीं गलियों में फिरते हैं। ये ऐसी गलियां जहां सूरज की किरणों को भी मशक्कत करनी पड़ती है। हवाओं को भी आगे बढ़ने के लिए जगह तलाशनी पड़ती है।

गंगा पाथवे कि योजना बनारस के लिए एक आपदा की मानिंद है। ये बनारस की पहचान को खत्म करने जैसा है। गंगा पाथवे के 40 फीट के रास्ते के दोनों किनारों पर कारोबारियों के लिए मॉल्स बनाए जाएंगे। विदेशी पर्यटकों के लिए सुख सुविधा की हर वस्तु उपलब्ध कराई जाएगी।

गंगा पाथवे की ये योजना विरोध के साए में लिपटी तो जरूर है लेकिन विरोध की आवाज को सरकार ने बड़े शातिराना तरीके से दबा भी रखा है। इस योजना के विरोध में धरोहर बचाओ समिति भी बनी है और उससे जुड़े लोग लगातार विरोध कर भी रहें हैं। हालांकि प्रशासन सुनने को तैयार नहीं है।

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काशी जिस आध्यात्म के लिए जानी जाती है उसे भव्यता के उजले लिबास में एक मार्केट पीस के तौर पर पेश करने की कोशिश घातक हो सकती है। हो सकता है कि कुछ लोग गंगा पाथवे के विरोध को, विकास का विरोध साबित करने का कुतर्क करें। ऐसे लोगों को दुनिया के धरोहरों के बारे में जानकारी एकत्र करनी चाहिए।


 

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