हम्बख के जंगलों में पेड़ों से चिपके हैं लोग, ना जाने दुनिया का क्या होगा

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इस बात की पूरी उम्मीद है कि 1973 से भारत के तत्कालीन उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के चमोली जिले से शुरू हुए चिपको आंदोलन के बारे में आप बहुत कुछ भूल चुके होंगे। हो सकता है कि भारत की नई पीढ़ी को इस आंदोलन के नाम भर के बारे में पता हो लेकिन वो गौरा देवी, चंडीप्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुणा जैसों के बारे में भूल गई हो। फिलहाल आपको याद दिलाना जरूरी है चमोली के जंगलों में लगे पेड़ों को बचाने के लिए लोग उन पेड़ों से चिपक कर खड़े हो गए थे। कई सालों तक ये आंदोलन चलता रहा और बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पेड़ों को काटने पर 15 वर्ष का प्रतिबंध लगा दिया था। चिपको की चर्चा फिर कभी अब जिक्र जर्मनी का।

जर्मनी में भी एक तरह का चिपको आंदोलन चलाया जा रहा है। ये आंदोलन दुनिया के सबसे पुराने जंगलों में से एक हम्बख के बचे हुए जंगलों को बचाने के लिए किया जा रहा है। इस जंगल का का तकरीबन 90 फीसदी हिस्सा खनन कंपनियों ने खत्म कर दिया है। जर्मनी की सबसे बड़ी खनन कंपनी RWE यहां से भूरा कोयला निकालती है। जर्मनी अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए इसका इस्तमाल करता है। हम्बख के 10 फीसदी जंगलों को बचाने के लिए अब दुनिया भर के पर्यावरण विदों ने पूरा जोर लगाया है। जिस आंदोलन को भारत वाले भूल गए हैं उसी चिपको आंदोलन की तर्ज पर हम्बख के जंगलों में लोग पेड़ों से लिपट कर उन्हें बचाने निकले हैं। जर्मनी के साथ अन्य देशों से लोग यहां पहुंचकर शांतिप्रिय प्रदर्शन कर रहें हैं। कई लोगों ने जंगलों में ही अपने अस्थायी निवास बना लिए हैं। प्रदर्शनकारियों की बड़ी तादाद अब हमेशा जंगलों के भीतर ही रहती है।

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दिलचस्प ये है कि हम्बख के जंगल उस जगह से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर हैं जहां हाल ही में विश्व पर्यावरण सम्मेलन संपन्न हुआ है। एक घंटे की ड्राइव पर इन जंगलों तक पहुंचा जा सकता था लेकिन पर्यावरण को बचाने के लिए एकत्र हुए दुनिया भर के प्रतिनिधियों ने हम्बख को बचाना जरूरी नहीं समझा। जर्मनी यूरोप के कार्बन उत्सर्जन का 20 फीसदी अकेले ही उत्सर्जन करता है।

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