गृह मंत्री जीवित हैं, मजदूर मर गए हैं। ट्वीट कर कौन बताएगा?

452
picture courtesy- google
picture courtesy- google

अच्छा लगा ये जानकर कि देश के गृह मंत्री स्वस्थ हैं, जीवित हैं। सुखी होंगे ये कामना है हमारी। पर गृह मंत्री जी, मजदूर मर गए।

मर गए वो रेल की पटरियों पर। पता नहीं क्यों निकले थे? शायद अपने परिवार को या फिर खुद को ही जिंदा बनाए रखने के लिए निकले थे। शायद उन्हें उनकी मौत की गंध मिलने लगी होगी। या हो सकता है उनका परिवार भूख से मरने की कगार पर आ गया होगा। डर गए होंगे।

पक्का डर ही गए होंगे

नहीं शायद….

नहीं, यकीन से नहीं कह सकते लेकिन सुना है मजदूर बहुत साहसी होते हैं।

होते भी हैं।इसमें दो राय नहीं है।

वो सदियों से निर्माण करते आए हैं। भविष्य का निर्माण। घरों का निर्माण। ये अलग बात है कि वो खुद बेघर से ही होते हैं। भीड़ में बेहद अकेले।

पटरियों पर सो जाना साहस ही हो सकता है। तकरीबन चालीस किलोमीटर तक चलते रहना…

इस पंक्ति में जोड़ लीजिए – तकरीबन चालीस किलोमीटर तक – पैदल चलते रहना। आसान नहीं हो सकता है। साहस चाहिए।

पास में कुछ रोटियां और चटनी। चटनी इसलिए क्योंकि सब्जी बनाने की स्थिती थी नहीं लिहाजा चटनी से काम चलाने का साहस। चलते चलते थक गए। सुबह चले थे, पैदल। चलते रहे। इस आस में कि उन्हें चलने से रोकने के लिए कोई तो साहस कर पाएगा।

थक गए ये उम्मीद लिए। रुक गए। मजदूरों को शायद रुकना नहीं चाहिए। चलते ही रहना चाहिए। साहस न बचे तो भी।

क्योंकि रुके हुए मजदूर को मौत बड़ी तेजी से अपनी ओर खींच लेती है।

वो कुल 16 लोग थे। अजीब साहसी। रेल की पटरियों पर ही सो गए। उन्हीं पटरियों पर जिन्हें शायद उनके जैसे ही मजदूरों ने बनाया होगा। पता नहीं क्या सोचा होगा सोने से पहले। शायद बच्चों के बारे में। या हो सकता है बुजुर्ग मां बाप के बारे में। शायद इस बरसात से पहले टूटी छत की मरम्मत के बारे में। बेटी को गांव के बाजार से एक नया सेट कपड़ा दिलाने के बारे में। मजदूर अपने बारे में नहीं सोचता। संभवत: साहस नहीं कर पाता।

अगर ये सोच उम्मीदों के तौर पर वर्गीकृत की जा सकती है तो इसे उम्मीदों के तौर पर समझ लेते हैं।

वो पटरियों पर इन उम्मीदों को लिए सो गए। इस उम्मीद में अगली सुबह उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचा देगी। लेकिन उन्हें इस बात की हरगिज उम्मीद नहीं रही होगी कि वो जिस मंजिल पर पहुंचेंगे वहां हर उम्मीद नाकाफी हो जाती है। वहां तो उन रोटियां और चटनी की जरूरत भी नहीं पड़ती जिन्हें वो अपने साथ लाए थे।

कैसा है ये साहस?

पता नहीं इस देश के कितने लोग ऐसा साहस रोज ही करते होंगे।

रेल की पटरियों पर सो जाने का साहस, तेल के टैंकरों में छिपने का साहस, सीमेंट मिक्सर के भीतर यात्रा का साहस।

खुद के बनाए रास्तों पर साइकिल से चलते रहने का साहस। साइकिल खरीदने के लिए अपनी जमा पूंजी बेच देने का साहस। अपने बच्चों को धूप में हजारों किलोमीटर तक बेसबब लिए चलते रहने का साहस। कौन कर पाता है छाले पड़े हुए पांवों में बोतलें बांध कर घर पहुंचने की जिद करने का साहस?

ये तो मजदूर होते हैं। साहसी। कोई नहीं करता इनके बारे में ट्वीट। या शायद साहस नहीं है। देश के किसी गृह मंत्री को नहीं देखा किसी मजदूर की बेबसी को स्वीकार कर पाने का साहस।

हम सब गुनहगार हैं। अपने मजदूरों के गुनहगार। आइए साहस करें। इसे स्वीकार करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here