दोपहर की तपती धूप और नंगे पांव दौड़ता वो शहर, कलकत्ता जेहन में यूं उतरता है

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कमल किशोर जोशी। कोलकाता को आधुनिक भारत की सबसे पुरानी नगरी कहा जा सकता है. सड़कों पर आज भी बेखौफ दौड़ती पीले रंग की एंबेस्डर कार को देखकर पुरानी हिंदी फिल्मों का दृश्य याद आ जाता है. दो वक्त की रोटी कमाने के लिए दोपहर की तपती हुई धूप में आग उगलती सड़क पर  नंगे पांव दौड़ते हुए उस बोझिल बूढ़े मजदूर द्वारा अपने बगैर मांस के हाथों  से खींचे जा रहे रिक्शे पर भुट्टा चबा रही वह काले चश्मे वाली  फैशनेबल  लेडी ब्रिटिश काल की याद दिला देती है. जनमानस का साधारण लिबास यहां सोशलिज्म के होने का आभास कराता है. सड़कों के किनारे अंधाधुंध अतिक्रमण से मालूम चलता है सरकारों ने वोट बैंक के लिए यहां भी कानून और व्यवस्था से समझौते किए हैं. हां, मगर दुकानों में माल लोकल ही मिलता है. ब्रांडेड चिप्स और नमकीन अभी बाजार की जड़ों में जगह बनाने में शायद कामयाब नहीं हो पाए हैं! इससे यह पता चलता है कि मेट्रो सिटी होने के बाद भी उदारीकरण और निजीकरण की छाया यहां अभी पूरी तरह पड़ी नहीं है.
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 जब आप किसी शहर में आते हैं तो थोड़ा बहुत घूमना तो बनता है. मैंने भी सोचा कि यहां आया हूं तो कहीं तो जाऊं. सुबह लगभग 4:30 बजे सुबह उठकर दक्षिणेश्वर काली मंदिर पहुंचा. बचपन से ही रामकृष्ण परमहंस के बारे में काफी कुछ पढ़ा था, सो बड़ी जिज्ञासा थी इस मंदिर को देखने की. मगर वहां जाकर लगा कि यह भी हिंदुस्तान के शेष मंदिरों जैसा ही है. वही फूलों की टोकरी लिए भक्तों की लंबी कतार, कहीं श्रद्धालु कीर्तन में मगन तो कहीं गंगा स्नान का सामूहिक आयोजन!
 स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित अद्वैत आश्रम मायावती मेरे गृह नगर लोहाघाट में स्थित है. उसी का इंटरलिंक मुझे हावड़ा में हुगली नदी के किनारे स्थित उनके  समाधि स्थल बेलूरमठ ले आया. बेलूर मठ में  स्वामी रामकृष्ण परमहंस,  उनकी पत्नी शारदा देवी तथा  स्वामी विवेकानंद की समाधि स्थित है. बेलूर मठ में आजकल कई स्वामी बैठते हैं. सारे टकले हैं और सब लगभग सारे ही ह्रिष्ट पुष्ट भी हैं. यहां पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस, शारदा देवी तथा स्वामी विवेकानंद का मंदिर बनाया गया है. स्वामी लोग खूब फूल पत्तियों से इनकी मन लगाकर पूजा करते हैं. समझ में नहीं आता है कि व्यक्ति के विचारों का अनुसरण करना उसकी वास्तविक पूजा है या उसकी मूर्ति बनाकर अगरबत्ती जलाना, दीए जलाना और फूल चढ़ाना? पता नहीं क्यों, मगर मुझे तो यही लगता है कि यह मानव श्रम और समय की व्यर्थ बर्बादी है. खैर समय व्यक्ति की व्यक्तिगत संपत्ति है और वह अपने समय के साथ  जो मर्जी करें, आपको क्या!
 वापस कोलकाता आते हुए हावड़ा ब्रिज के भी दर्शन हो गए. ड्राइवर ने बताया कि यह बिना नट-बोल्ट का ब्रिज है और हिंदुस्तान के सबसे पुराने पुलों में से एक है. कुछ ही  देर में हमारी गाड़ी वापस कोलकाता की सड़कों पर दौड़ने लगी. यहां की एक अच्छी बात यह है कि यहां पर गरीब आदमी भी अपना पेट आसानी से भर सकता है. खाने पीने की चीजें सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं. यहां की ताजा पानी की मछली से बनने वाला ‘माछेरझोल’ बड़ा मशहूर है और अगर तमीज से बना हो और बदबू ना आ रही हो तो खाने में बड़ा लजीज भी है! कल रात में भात के साथ यह माछेर झोल खाना वाकई एक आनंददायक अनुभव रहा.
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इन दिनों नेताजी सुभाष इंडोर स्टेडियम में #abptouristspot का आयोजन किया जा रहा है जिसमें मुझे उत्तराखंड टूरिज्म का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला. इस दौरान  लोगों  से रूबरू होते हुए अनुभव हुआ कि यहां के लोग बड़े जिज्ञासु प्रवृत्ति के  हैं, शायद सबसे ज्यादा घुमक्कड़ भी ! मगर ‘दादा’  किसी पर जल्दी भरोसा नहीं करता. दसों सवाल पूछता है , बीस जगह क्वेरी करता है तब जाकर अपना मन बनाता है. प्राइवेट एंटरप्रेन्योर्स के मुकाबले सरकारी संस्थाओं के प्रति उसका विश्वास आज भी अपेक्षाकृत अधिक है. वह अगर दो टका खर्च करता है तो ढाई टका का आउटपुट बदले में चाहता है. वह आज भी हर ब्रोशर और फोल्डर को तबीयत से पढ़ता है और उस पर दिए गए तथ्यों पर आंख बंद कर भरोसा करता है. और यही नहीं उसमें किसी तरह की गलती होने पर वापस आकर आपको टोकता भी है.
 उत्तराखंड की बात करें तो चार धाम यात्रा को लेकर बंगाली पर्यटक में काफी आकर्षण है. स्वामी विवेकानंद के मायावती आश्रम के बारे में सभी बंगाली लोग बात करते हैं. इसके अलावा ट्रैकिंग का शौक भी यहां के लोग रखते हैं. एक बात माननी पड़ेगी कि जिस उम्र में हमारे यहां आदमी बाजार तक जाना बंद कर देता है, यहां के बुजुर्ग  लोग  उस उम्र में  भी अपने दम पर दुनिया घूमने का साहस रखते हैं.  यहां का बजट टूरिस्ट हमारी उत्तराखंड सरकार की होमस्टे की पहल को लेकर काफी उत्साहित है आने वाले समय में उत्तराखंड के होमस्टे बंगाली टूरिस्ट का फेवरेट डेस्टिनेशन बन सकते हैं.
विक्टोरिया मेमोरियल के बारे में काफी सुना है लोगों से. अगर समय मिलेगा तो शायद जाऊंगा. आगे की कहानी फिर आपको सुनाता हूं तब तक के लिए बाय-बाय!
(ये लेख कमल किशोर जोशी से साभार प्राप्त हुआ है। कमल उत्तराखंड पर्यटन विभाग में जन संपर्क अधिकारी हैं और यात्राओं के शौकीन हैं। ये लेख उन्होंने अपने हालिया कोलकाता प्रवास के दौरान हमें भेजा है।)

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