कबीर के बहाने काशी में हिंदुओं की आस्था से खेल तो नहीं रहे नरेंद्र मोदी, पूछना जरूरी है

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kabir dasसियासत अपने नफा नुकसान के लिए बड़ी महीन सी लकीरों को खाई में किस तरह बदल देती है ये समझना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कबीर की जयंति के मौके पर कबीर के परिनिर्वाण स्थली मगहर में जाना और काशी में मोक्ष मिलने की अवधारणा को पाखंड बताना एक बड़ी महीन सी लकीर को खाई में बदलने के लिए काफी है। हो सकता है कि मगहर से कबीरपंथियों को साधने की हसरत में पीएम मोदी और बीजेपी सफल हो जाए लेकिन इस बात की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि जिस काशी ने अपनी व्यापक सोच के तहत कबीर को अपने सानिध्य में स्थान दिया वहां एक नया विवाद शुरु हो जाए। फिर जयंती के मौके पर परिनिर्वाण स्थली में समारोह करना भी समझ से परे है।

फिर जब देश का सामान्य जनमानस स्थापित किवंदतियों में रच बस जाए और उन्हें फिर से कुरेदा जाए तो क्या कहिए। पीएम मोदी की माने तो कबीर ने अंधविश्वास से विद्रोह कर मगहर में शरीर छोड़ा था। 24 जून को मन की बात में भी पीएम मोदी ने काशी में मरने पर मोक्ष मिलने की अवधारणा को कुरीति करार दिया था।  तो ऐसे में स्वाभाविक तौर पर ये प्रश्न कबीर को साधने के बहाने काशी और शिव के साथ ही शिव की नगरी देह त्यागने वालों के प्रति अविश्वास जताना ही है।

 pm modi in magharऐसे में पीएम मोदी जिसे कबीर के बहाने अंधविश्वास और पाखंड बता रहें हैं उस मान्यता के माएने हिंदू धर्म में हैं क्या। ऐसे में पहले कबीर के मगहर जाने के लिए लिखे दोहे को पहले पढ़ लीजिए –

का कासी का ऊसर मगहर

राम रिदै बसु मोरा

जो कासी तन तजे कबीरा

रामे कौन निहोरा

तो कबीर की माने तो काशी में ही मर कर अगर मोक्ष मिलना है तो फिर राम का नाम जपने का क्या फाएदा।

यहां ये स्पष्ट करना जरूरी है कि कबीर राम को तो मानते थे लेकिन काशी में मोक्ष मिलने की बात को वो पाखंड या अंधविश्वास के तौर पर मानते थे। लिहाजा अपना शरीर छोड़ने से पहले वो काशी छोड़कर मगहर चले गए।

अब याद कीजिए तो कास्यां मरणान्मुक्ति की अवधारणा तो काशी के साथ अनंत काल से चली आ रही है। फिर स्कंद पुराण के काशी खंड में काशी में मोक्ष के संबंध में लिखा गया

भूमिष्ठापिन यात्र भूस्त्रिदिवतोsप्युच्चैरध:स्थापिया

या बद्धाभु विमुक्ति दास्युर मृतं यस्यां मृता जन्तव:

शास्त्रों में लिखा भी है –

यत्र कुत्रापिवा काश्यां मरणे समहेश्वर:

जन्तोर्दक्षिण कर्णे तुमत्तारं समुपादिशेत

ऐसी मान्यता है कि काशी में कहीं भी देह त्यागने पर स्वयं भगवान शिव ही मरने वाले के दाहिने कान में तारक मंत्र देते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

फिर रामकृष्ण परमहंस ने भी काशी में मरने वाले के कान में भगवान शिव के तारक मंत्र देने का जिक्र किया है।

तो ऐसे में क्या मान लिया जाए कि जो काशी अपने विराट सोच और व्यापकता के तहत शिव के साथ कबीर को भी आत्मसात करती रही उसी कबीर पंथ को लुभाने की कोशिश हो रही है और ये कोशिश काशी की पौराणिक मान्याताओं को चोट पहुंचा रही है। फिर पीएम मोदी को काशी में मरने और मोक्ष मिलने की अवधारणा के बारे में पता न हो ऐसा मानना जरा मुश्किल है तो कहीं ऐसा तो नहीं कि पीएम मोदी भी कबीर की ही तरह काशी में मोक्ष की अवधारणा को अंधविश्वास मानते हों।

काशी में जो लोग मुक्ति लाभ भवन के बारे में जानते होंगे उन्हें पता होगा कि किस तरह बुजुर्ग लोग अपनी देह त्याग करने के लिए इस भवन में आकर रुकते हैं। इस मुक्ति लाभ भवन के रिकॉर्ड्स के मुताबिक अब तक सोलह हजार से अधिक लोग यहां देह त्याग चुके हैं। फिर काशी में ऐसे ही कई अन्य गेस्ट हाउस और लॉज हैं जहां लोग देह त्याग के लिए आते हैं।

ऐसे में मगहर में जाकर मोदी का अंधविश्वास से लड़ने की कबीर की फिलासफी को दोहराना उस इलाके में वोटों की फसल को काटने की एक राजनीतिक कोशिश तो है ही क्योंकि मोटे अनुमान के मुताबिक कबीर पंथ से तकरीबन 20 करोड़ अनुयायी जुड़े हुए हैं। अधिकतर अनुयायी दलित वर्ग से आते हैं। लेकिन इस सबके बीच वोट बैंक की राजनीति के लिए धार्मिक मान्यताओं पर चोट करना कितना सही हैफिर जब पीएम मोदी उसी संसदीय सीट से चुन कर आते हैं।

अब ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या काशी में देह त्याग से मोक्ष मिलने को अंधविश्वास और पाखंड बताने वाले पीएम मोदी अपने इस दर्शन पर कायम रहने का साहस काशी में भी दिखा पाएंगे।

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