आपको हिमालय ने अब तक जिंदा रखा, आप उसे बचा भी लें तो बड़ी मेहरबानी होगी

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दुनिया में हिमालय तीसरी ऐसी जगह जहां सबसे अधिक बर्फ पाई जाती है। कहने वाले इसे नार्थ और साउथ पोल के बाद थर्ड पोल भी कहते हैं। हिमालय इस दुनिया जहान की बड़ी, बड़ी मतलब बड़ी आबादी को जिंदा रखता है। दक्षिण पूर्व एशिया के लिए ये हिमालय एक ऑक्सीजन फैक्टरी की तरह है। भारत जैसे देश के लिए हिमालय प्रकृति की अनुपम देन है। हिमालय दुनिया की सबसे नवीनतम पर्वतमाला है और अपने निर्माण के दौर में है। यही वजह है कि हिमालय में भूगर्भीय हलचलों निरंतर चलती रहती हैं।

हिमालय को लेकर हमारी सोच बेहद उदार है। उदार इस माएने में हमें लगता है कि हिमालय इतना बड़ा है कि हम इंसानों की गतिविधियों का हिमालय पर कोई खासा प्रभाव नहीं पड़ेगा और थोड़ा बहुत अगर पड़ भी गया तो हिमालय में रहने वाले करोड़ों देवी देवता उसे संभाल लेंगे। अब समय हिमालय को हिमालय के भरोसे छोड़ने का नहीं रहा। हिमालय को बचाने के लिए वैज्ञानित और सामाजिक पहल करने की जरूरत है। दो वर्ष पहले एक अध्ययन के मुताबिक पिछले पांच दशकों में हिमालय के 16 फीसदी हिमनद पिघल चुके हैं। हो सकता है कि आपको 16 फीसदी का आंकड़ा कम लग रहा हो लेकिन 16 फीसदी हिमनदों का पिघल जाना एक वैश्विक (‘ग्लोबल’ लिखने पर अधिक समझ आएगा) पर्यावरणीय चिंता है। जम्मू कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम जैसे भारत के हिमालयी राज्यों में हिमनद लगातार पिछे खिसक रहें हैं या गल रहें हैं। 1962 से दस घाटियों में 1317 हिमनदों का कुल क्षेत्रफल 5866 वर्ग किमी से घटकर 4921 वर्ग किमी ही रह गया है।

दुखद ये है कि हिमालयी राज्यों में विकास का वही मॉडल प्रयोग में लाया जा रहा है जो अन्य राज्यों में इस्तमाल हो रहा है। यहां उत्तराखंड में चल रही ऑल वेदर रोड का उदाहरण देना ही काफी है। इस योजना के तहत उत्तराखंड में बने चार धामों को जाने वाली सड़कों का चौड़ीकरण किया जा रहा है। इस कार्य में अब तक औपचारिक तौर पर तकरीबन पचास हजार पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी गई है। ये औपचारिक अनुमति है और अनौपचारिक रुप से ये आंकड़ा इसका दुगुना हो सकता है। इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों का काटा जाना उस हिमालयी इलाके के लिए भूगर्भीय तौर पर बेहद घातक है। पेड़ों के कटने से पहाड़ों की मिट्टी मुक्त हो जाती है और भूस्खलन की शुरुआत होती है। ये एक भयावह स्थिती को आमंत्रण है। हिमालय युवा और प्रतिक्रियावादी भी। अपने तल पर हो रहे अनियंत्रित दोहन पर प्रतिक्रिया भी कर सकता है। हालांकि लगे हाथ ये भी बता दें कि पचास हजार पेड़ों को काटे जाने के बाद नए पौधे कहां लगाए जाएंगे ये अभी तय नहीं है।

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