बेटियों को लिहाज के साथ अब बदलिहाजी भी तो सिखानी होगी।

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आज मेरी बेटी बताए वक्त से बीस मिनट देर से घर पहुंची. लोगों को ये बात बेहद आम लगे लेकिन मैंने ये बीस मिनट किस दहशत में गुज़ारे हैं ये शब्दों से बयान कर पाना मुश्किल है. एक एक लम्हा पहाड़ जितना भारी था. दरवाजे और बालकनी के बीच पचास चक्कर काट लिए होंगे मैंने. चैन तब आया जब लिफ्ट से बेटी की आवाज़ सुनाई थी. राहत तो हुई पर उसे देखते ही इस बीस मिनट की बेचैनी की भड़ास मैंने उसपर निकाल दी. ज़ोरदार डांट लगाई, ये जानते हुए भी कि बच्ची है खेलने में वक्त का पता नहीं चला होगा. हंसती हुई आई वो मासूम उदास हो गई थी. ना चाहते हुए भी उसकी आज़ादी पर पहरा लगाना पड़ा. एक मां की ख़्वाहिश अपने बच्चे को हंसता मुस्कुराता देखने की होती है लेकिन मेरी तमन्ना उससे भी ज्यादा उसे ज़िंदा और सही सलामत देखनी की है. हैवानियत की खौफनाक कहानियां रोज़ सुनती हूं. दहले हुए इस दिल से बस इस कोशिश में लगी हूं कि उन कहानियों के किरदारों में कभी उसका नाम ना आए. पिछले दिनों जिन मासूमों ने कयामत का वो लम्हा देखा है उनके बारे में सोच के ही रूह कांप जाती है. उनके माता-पिता को जो दर्द मिला है उसके एहसास मात्र से आंखे नम हो जाती हैं.

अड़तिस सालों में मैं खुद पूरी तरह ये समझ नहीं पाई कि समाज में भरोसे का फिल्टर कब और कहां लगाना है फिर वो तो नन्ही बच्ची है. किसी पर भी आसानी से ऐतबार कर लेती है. ऐसे में आम से दिखने वाले शख़्स के अंदर की दरिंदगी वो कैसे पहचान पाएगी. समाज में मौजूद वहशियों की जमात दिन-ब-दिन बेखौफ होती जा रही है. ना तो इन्हे कानून का डर ना उपरवाले का. हवस मिटाने के लिए वो ज़िंदा तो ज़िंदा मुर्दों को भी नोच खाने से परहेज़ नहीं कर रहे.कोई गारंटी नहीं कि ऐसे राक्षस हमारे या आपके आसपास ना हों. अब तक हम सुरक्षित हैं तो ये बस उपर वाले की कृपा है. शायद अब तक इन राक्षसों को हमारे खिलाफ वो कमज़ोर लम्हा नहीं मिला.

वक्त ऐसा हो चला है कि एक छोटी नादानी, एक हल्की लापरवाही भी इन सोए हैवानों को जगा सकती है. पिछली पीढ़ियों में… दर्जनों अपनों के बीच उम्र गुज़रती थी पर आज की पीढ़ी के नसीब में ना तो वो दर्जनों हैं ना ही अपने. भागती दौड़ती ये ज़िंदगी.. अमूमन अकेले ही गुजार रही है. ऐसे में ज़रूरी है लड़कियों का इतना सशक्त होना कि वो ऐसे किसी भी वहशत से टकरा सकें. जब जमाने को बदल नहीं सकते तो उससे लड़ने की ताक़त होनी ज़रूरी है और ये मासूमियत के सहारे संभव नहीं. नाज़ुक बचपन को कठोर करना होगा. अल्हड़पन को समझ की चादर ओढ़ानी होगी. विश्वास का पाठ नए सिरे से समझाना होगा. बुराईयों से सिर्फ दूर रहना नहीं बल्कि उसे मुंहतोड़ जवाब देना सिखाना होगा. प्यार ही नहीं गुस्से की भी ज़रूरत बतानी होगी. लिहाज़ के साथ साथ थोड़ी बदलिहाज़ी भी सिखानी होगी. बेखौफ ज़िंदगी गुज़ारनी है तो इन वहशी दहशतगर्दों को उनकी हद में बांधना होगा…. मेरी मानो तो लड़कियों को अब बर्दाश्त करना और खामोश रहना नहीं, बल्कि शोर करना सिखाओ. नाज़ुक लड़कियों को लोहा बनाओ, मां दुर्गा मां काली बनाओ क्योंकि ताउम्र डर के साए में जी नहीं सकते और ऐसे हालात से समझौता हो नहीं सकता।

shikha kajal ये वाक्यांश हमने independent orater के तौर पर पहचान रखने वालीं शिखा काजल की फेसबुक वॉल से लिया है। हमने इसे यहां हूबहु पोस्ट किया है।

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