मोहल्ला अस्सी – बाज़ार के सामने घुटने टेकते फिल्मकार-रचनाकर

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सत्यदेव त्रिपाठी: बाज़ार के आक्रमण से नष्टप्राय होते मूल्यों का मुद्दा अब इतना पुराना हो गया है कि उस पर कुछ कहना अमूमन इतना मुश्क़िल हो गया है। फिर भी कला की दुनिया में अभिव्यक्ति की नव-नवा सम्भावनाएं हमेशा होती हैं…। लेकिन फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ इस मुद्दे को उठाते हुए ऐसी सम्भाव्यताओं की कसौटी पर बुरी तरह फेल हो गयी है। फिल्म से यह पता नहीं चलता कि फिल्मकार बढते बाज़ार व उससे नष्ट होती परम्पराओं व संस्कृतियों के साथ है या उसके ख़िलाफ है। और सन्नी देवल नहीं समझ पाते कि ‘घातक’ बनें या घायल। इन्हीं दोराहों में भटकती रह जाती है फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’…।

इस मामले में लेखक काशीनाथ सिंह और निर्देशक द्विवेदी बाज़ार को मान लेने की जिस एक ही ज़मीन पर खडे हैं, वह साहित्य व कला की ज़मीन है ही नहीं। ‘काशी का अस्सी’ (2002) के समय में ही बाज़ार हावी हो चुका था, जिससे आगे न बढ सका ठाकुर साहेब का ब्राह्मण पात्र। और जब (2012 के आसपास) फिल्म बनी और आज छह साल बाद जब निर्माता-निर्देशक के आय-व्यय व अहम के द्वन्दव तथा सेन्सर के बस्ते से बाहर आयी है, तो बाज़ार आतंक बनकर इस क़दर छा गया है कि उसकी गिरफ्त से किसी का भी बचना नामुमकिन-सा हो चला है। ऐसे में जो जीवन जी रहे हैं निर्देशक, उसकी मुख़ालिफत न कर पाना एक तरह की मज़बूर ईमानदारी भी है। क्योंकि बेटी के ‘कम्प्युटर क्लासेस’ की फीस न दे पाने और संस्कृत पाठशाले से नौकरी छोडने का नोटिस पा जाने भर से फिल्म का नायक बाज़ार के सामने जिस तरह घुटने टेक देता है, उसे देखकर लगता है कि या तो काशी व चन्द्रप्रकाश को ऐसे विषय को छूना ही नहीं था और उठा ही लिया, तो इतना निर्वैयक्तिक व विचार-सिद्ध हो जाना था कि सही ढंग से उसे साध पाते। भूल जाइये उसी काशी में बिककर व बेटे की मौत पर भी पत्नी तक से कर वसूलने की कीमत चुकाने की विरासत…,  सुरेन्द्र वर्मा (मुझे चाँद चाहिए) व सागर सरहदी (बाज़ार)…के पात्रों की तरह जान ही दे पाते। प्रदीप सरकार (परिणीता) की तरह बाज़ार को तोड न पाते, तो शंकर (सीमाबद्ध) व ‘बासु भट्टाचार्य’ (आस्था) की तरह उसका दंश तो छोड पाते। ‘जॉली एलएलबी’ और ‘जॉलीएलएलबी-2’ की तरह किये के पश्चात्ताप से ही बाज़ार (काला ही सही) का मुक़ाबला कर पाते…। वरना ‘काशी का अस्सी’ और ‘मोहला अस्सी’ से समवेत बात यह निकलती है कि बाज़ार के सामने झुकना ही है…। लगता है कि फिल्म यह बताने के लिए बनी है कि बनारस में ज्ञान व योग तक का बाज़ारीकरण हो गया है। अब ‘सियावर रामचन्द्र की जय’ बोल दो। संवाद ही है – वह दिन दूर नहीं, जब हवा भी बेची जायेगी।

कृति व फिल्म में बाज़ार बनाम मूल्यवत्ता का माध्यम बना है काशी में विदेशियों का आना और गंगा के दृश्य-सौन्दर्य के आनन्दवश किनारे के छोटे-छोटे कमरों को महँगे दामों भाडे पर ले लेना, जिसके चलते मल्लाह…आदि छोटी जातियों के लोग सुखी-समृद्ध जीवन-यापन करने लगे हैं। लेकिन ब्राह्मण-समुदाय विजातियों के प्रवेश से घर के अपवित्र और अपने धर्म व संस्कृति के भ्रष्ट होने के डर से ऐसा नहीं करता। बल्कि सच यह है कि चाहते हैं सारे ब्राह्मण भी ऐसा कर लेना, पर सबका अगुआ है धर्मदत्त पाण्डेय – धर्म-निष्ठता में अडियल। और यूँ उसका अकेले ऐसा होना हीरोगीरी वाला फिल्मी सच ही है, वरना पूरे मोहल्ले में वह अकेला ही ऐसा न होता। और ये धर्मदत्त हैं हीरो सन्नी देवल, जो अपनी सारी स्टंट फिल्मों में दर्जनों गुण्डों-गद्दारों-स्मगलरों-लुटेरों…आदि के सामने अकेले ही सही-ईमानदार-लडाकू और ‘जिद्दी’ जैसी फिल्मों में सताये अवाम को एकजुट करके बदला लेने में समर्थ होते हैं। वही काम वह यहां बस तेवर भर से कर देते हैं। पर दर्शकों ही नहीं, गोया सौरभ शुक्ला जैसे साथी पण्डे पात्रों व कलाकारों के मन में भी उन फिल्मों की छबि-छाप का डर बैठा है, वरना वे उससे इतना डरते क्यों? क्या सन्नी को लेने का मक़सद भी ऐसा होने को आसान कर देने की गरज़ ही थी या सन्नी देवल के मिल जाने को पण्डितजी के एकमात्र हिट या फ्लूक ‘पिंजर’ में मनोज-उर्मिला (पिंजर) की तरह भुना लेने की आदत…!! चाहे हो भले जो भी, लेकिन बनारस के पीडीआर मॉल में तीसरे दिन ही मात्र 20-25 दर्शकों का होना यह साबित कर देता है कि मार-धाड व ढाई किलो के हाथ वाली अपनी ही बनायी छबि में क़ैद सन्नी का अब छुटकारा नहीं। इसे वे भी जान गये हैं, जिसका प्रमाण है आते शुक्रवार को ‘भय्याजी सुपर हिट’ में उत्तरप्रदेश के डॉन का रूप धरकर अपनी उसी छबि के और वीभत्स रूप में उनकी वापसी – ‘लौट के बुद्धू घर को आये…।

संस्कृत के अध्यापक की संस्कृत सन्नी देवल पर ढाई किलो के हाथ जैसी पडी है। इससे सन्नी का तो कुछ न बिगडा – उन्हें पता ही क्या!! ‘चाण्क्य’ के द्विवेदी पर कैसी पडी, वो जानें; पर ख़ामियाज़ा भुगत रही है फिल्म। और भाषा के भदेसपन में लेखक व निर्देशक का हिस्सा पुन:  बराबरी का ही है। कौन संस्कृत अध्यापक ब्राह्मण ‘भोसडी के’ बोलता है? काशीनाथ उसी शहर में हिन्दी के प्रोफेसर रहे। क्या ऐसा बोलते हैं? कौन अध्यापक बोलता है? कौन पण्डितानी बोलती है? फिर दोनो तथाकथित महारथियों द्वारा यह झूठ काशी का बेज़ा दोहन नहीं, तो और क्या है? फिल्म में तो जबर्दस्ती के इरादतन भदेसपन ठूँसने का प्रमाण है मल्लाहिन का पण्डितानी से कथन – वो अंगरेजिन कह रही थी कि हमरा दूनो टाँग़ के बीच बहुतै गरमी लागत है…। क्या यह ज़रूरी था? क्या यह सच है? क्या सारी विदेशी औरतें अय्याशी के लिए ही यहाँ आती हैं? एक संवाद यूँ भी है – ज़लील करना व ज़लील होना काशी की संस्कृति है। तो किस काशी और काशी की किस संस्कृति को पेश किया जा रहा है? फिर फिल्म के तो भगवान शिव भी गालियां बोलते हैं!! किसी को तो बख़्श देते भगवन…!!

फिल्म का हीरो मस्जिद-ध्वंस में भी जाता है…, पर उसे पटा-निपटा भर दिया जाता है।   उपन्यास का अनुसरण करती फिल्म धर्मदत्त के घर के अलावा घाट पर और अस्सी की मशहूर मुन्ना चाय वाले की अडी पर भी चलती है। किंतु अडी वाला पूरा हिस्सा वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) भर बनकर रह गया है, जिसमें ज़िबह हो गया है मण्डल-कमण्डल जैसा राजनीति का ऐतिहासिक मोड वाला मामला भी। और चाय की अडी पर शहीद हो गये हैं राजेन्द्र गुप्त, अखिलेन्द्र मिश्र, विजय कुमार जैसे कलाकार। मुकेश तिवारी को ज़रूर कुछ हल्ले-गुल्ले का काम मिल गया है। बिना वजह के शामिल हुए दीनबन्धु तिवारी बने पात्र का रूप हू-ब-हू मिलता है, पर गया सिंह में तो रूप-भाषा-दिमांग़ सब किसी और या किन्हीं औरों का भर दिया गया है। ऐसी कतर-व्योंत तमाम दृश्यों-चरित्रों में यूँ हुई है जैसे पेबन्दों से सिला मुफ़लिस का क़बा (चोंगा)। यह सूरत चाहे सेंसर ने बख़्शी हो या स्वयं डॉक्टर ने, नुक्सान तो ‘फिल्लम’ का ही हुआ है। यह बात दीग़र है कि ‘ज़ेड प्लस’ के बाद जो दस-बीस दर्शक बचे थे आदरणीय द्विवेदीजी के, वे भी अब ‘बल्कि पूछेगा ख़ुदा, तो भी मुकर जायेंगे…।

हाँ, अब तक की हमारी ज़ेहन में बनी अपनी छबि को अच्छा विस्तारा है रबिकिशन ने, जो उपन्यास के कन्नी गुरु हैं और फिल्मी उल्लेखों में गन्नी गुरु बन गये हैं। विदेशियों से बात करते पर्यटन गाइड वाली उनकी अंग्रेजी भी कमाल की लिखी गयी है। काश, हिन्दी वाले अंश उस भाषिक रवानग़ी के धोवन भी होते…! और साक्षी तँवर को हमने सीरियल में तो देखा नहीं, पर सुना था जैसा उनका नाम, यहाँ का काम भी उसकी तस्दीक करता हुआ आया। बात के साथ रबिकिशन के शरीर की अँगडाई जितना बोलती है, साक्षी की आँखें ही उसकी भरपाई करती हुई गोया उस पंक्ति को साकार करती हैं कि ‘छूने न दूँगी मैं हाथ, नज़रियों से जी भर दूँगी’। घर में विदेशिन पेएंग गेस्ट के आ जाने पर गृह स्वामिनी के नौकरानी बन जाने की नग्न सचाई का जो काल्पनिक दृश्य सिरजा गया है, गज़ब का है। उसके बाद आशा बँधने लगी थी कि हुंकार देगा यह ‘घातक’-‘इण्डियन’, पर वह तो रचनाकार-फिल्मकार की कठपुतली भर बनकर अडी पर मन मारे गमगीन बना बैठा रह जाता है। और बाज़ार का कारवां सर पर चढकर नाचने लगता है और ‘मोहल्ला काशी’ उसकी भदरायी नज़रों से ग़ुबार देखता रह जाता है…।

और अंत में सोशल मीडिया के एक टिप्पणीकार की जानिब से ‘फिल्म का आख़िरी हिस्सा आने तक दिमांग (उसी ग़ुबार से) इतना बोझिल हो जाता है कि गुलज़ार के एकमात्र गीत सुनने के लिए कोई रुकना नहीं चाहता – अलबत्ता गीत सुनने लायक भले न हो, देखने लायक ज़रूर है। पर देखते कैसे…तब तक हॉल में स्वीपर झाडू-डब्बा लिये घूमने लगे थे’। पता नहीं निर्माता विनय तिवारी बिचारे के हाल क्या होंगे…!!

मोहल्ला अस्सी फिल्म की यह समीक्षा प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक सत्यदेव त्रिपाठी से साभार प्राप्त हुई है।

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