ख़ामोशी

अक्सर चुप सी बैठ जाती है ख़ामोशी और मुझसे कहती है बतियाने के लिए कहती कि आज तुम बोलो मैं सुनना चाहती हूँशब्द ही नहीं मिलते हैं मुझको उससे बात करने के लिएचुप सा रह जाता हूँ बस फटी आँखों से देखता हूँ वो कहती कि तुम भी अजीब हो मुझे में ही समो जाते हो खामोश हो जाते हो बस खिलखिलाकर हंस देती है ख़ामोशी.मैं चुप बस देखता रहता...

थूक पार्ट -टू, आज नहीं थूके तो कल आप पर थूकेगा

चौंसठ सालों से हम सब अपनी थूक इसलिए निगलते आ रहे हैं क्योंकि सरकारी कागजों में सार्वजनिक स्थानों पर थूकना अपराध...

तुम्हे भी तो प्रेम है

अक्सर तुम्हारे बिम्ब का आकार उतर आता है मुझमे निराकार साकार क्या है कुछ भी तो नहीं कह सकता हाँ यह...

अब यह संकल्प लेना होगा इस देश में रहने वाले राजनीतिक रूप से तो आजाद हैं लेकिन मानसिक रूप से आजादी का...

एक बार याद उन्हें भी कर लिया होता।

जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में जितनी बार नाम राहुल गांधी का लिया गया अगर उसका एक फीसदी हेमराज और...

कहानी मैगी से आगे भी है, जो अनसुनी है

मैगी पर देश भर में बैन लग जाने के बाद ये लग रहा है मानों पूरे देश में खाद्य पदार्थ पूरी...

शुक्र है! ये कौम मुर्दा नहीं….

देश में लोकतंत्र बेहद मजबूत हो गया है लेकिन लोगों की बातें इस तंत्र में नहीं सुनी जाती....लोग बोलते बोलते...

एक कविता

सड़क पर बिखरी धूप सावो अक्सर मेरे साथ रहता हैयहाँ वहांहवा के हर झोंके मेंवो मिलता हैमेरे...

लाहौर पर ही तिरंगा फहरा दोगे क्या?

समझ में नहीं आता कि इस देश के लोगों को हो क्या गया है? आखिर वो करना क्या चाहते हैं? तिरंगा...

वो मां जो बच्चे को जिंदा रखने की खातिर उसे जी भर के सोने भी नहीं देती…

मैं और पूरा परिवार तो उस वक्‍त बेहद खुश था, जब यर्थाथ हमारी जिंदगी में आया. हमारी तो पूरी दुनिया ही उसके इर्द-गिर्द सिमट...

मोहल्ला अस्सी – बाज़ार के सामने घुटने टेकते फिल्मकार-रचनाकर

सत्यदेव त्रिपाठी: बाज़ार के आक्रमण से नष्टप्राय होते मूल्यों का मुद्दा अब इतना पुराना हो गया है कि उस पर कुछ कहना अमूमन इतना...

सांप्रदायिक आग का कड़वा ‘धुआँ’- सत्यदेव त्रिपाठी

पिछले दिनों संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से गुलज़ार साहब की कहानी 'धुआँ' का मंचन मुम्बई के 'जुहू जागृति' हाल में हुआ। आज...

सिर्फ सानंद नहीं मरे, मरी तो उम्मीदें हैं…बिल्कुल मुर्दा जैसी…

एक ओर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चैंपियन ऑफ अर्थ का पुरुस्कार ले रहे थे तकरीबन उसी दौरान स्वामी सानंद गंगा की निर्मलता के...

‘मंटो’ : सच के आईने की त्रासदी….

मैं अपनी कहानियों को एक आईना समझता हूँ, जिसमें समाज अपने को देख सके। -और यदि सूरत ही बुरी हो, तो आईने का क्या...? -मैं सोसाइटी...