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देश की वो घटनाएं जो आप पर प्रभाव डालती हैं। जिन्हें एक अलग नजरिए से समझना भी जरूरी हो।

ये गौरी लंकेश की कलम से निकले आखिरी शब्द हैं, आपको पढ़ना चाहिए

गौरी लंकेश नाम है पत्रिका का। 16 पन्नों की यह पत्रिका हर हफ्ते निकलती है। 15 रुपये कीमत होती है। 13...

इंसान के बच्चे सड़क पर पैदा हो रहें हैं और अस्पतालों में मर रहें हैं लेकिन हम गाय बचा कर खुश हैं

दो घटनाएं हमारे देश के स्वास्थ सेवाओं की बदहाली की स्पष्ट नजीर हैं। एक खबर आई कि एक महिला ने सड़क...

इसी भारत में है वो शहर, वो मकान, जहां लोग खुशी से मरने जाते हैं, मर गए तो नसीब उनका

भारत में एक ऐसी भी जगह है जहां लोग मरने के लिए जाते हैं। मौत के इंतजार में बकायदा बुकिंग कराई...

आपका इंटरनेट आपकी निजता का रोज हनन करता और वो भी आपके सामने

आज की दुनिया में इंटरनेट से कोई भी अछूता नहीं है। आप खुद भी अब हर पल इंटरनेट से जुड़े रहना...

ये हैं 1962 में हुए भारत चीन युद्ध की तस्वीरें

एक तस्वीर में हजार शब्द करने की ताकत होती है। इस पोस्ट में हम भारत और चीन के बीच 1962 में...

इसी भारत में महिलाओं को माहवारी की छुट्टी भी मिलती है और यहीं सेनेटरी पैड भी मयस्सर नहीं

हम जिस दौर में जी रहे होते हैं उसे अपने ही अतीत से हमेशा बेहतर मानते हैं। ये एक साधारण सामाजिक...

वो महिला जो तीन तलाक की जंग जीत चुकी थी लेकिन राजीव गांधी ने उसे संसद में हरा दिया था

ये वाक्या सन 1978 का है। मध्य प्रदेश के एक वकील हुआ करते थे मोहम्मद अहमद खां। साहब हुजूर ने अपनी...

वो शहनाई का जादूगर था, इंसानी जज्बातों का रखवाला भी, वो बिस्मिल्ला था

बिस्मिल्लाह खां को यूं तो पूरी दुनिया जानती है लेकिन जो लोग उनसे मिले थे वो बिस्मिल्ला खां को उनके संगीत...

माटुंगा की खुशी बांटी जाए, फिर खुशी बढ़ाने की सोची जाए

महाराष्ट्र का माटुंगा रेलवे स्टेशन हाल में पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में दे दिया गया। ये देश का ऐसा...

अंगुलियों पर गिनी जानी वाली मौतें अब मुट्ठियां भरने लगीं हैं

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पांच दर्जन से अधिक बच्चों की मौतें भारत के आधुनिक इतिहास में ना भूला जाना...

वो मां जो बच्चे को जिंदा रखने की खातिर उसे जी भर के सोने भी नहीं देती…

मैं और पूरा परिवार तो उस वक्‍त बेहद खुश था, जब यर्थाथ हमारी जिंदगी में आया. हमारी तो पूरी दुनिया ही उसके इर्द-गिर्द सिमट...

मोहल्ला अस्सी – बाज़ार के सामने घुटने टेकते फिल्मकार-रचनाकर

सत्यदेव त्रिपाठी: बाज़ार के आक्रमण से नष्टप्राय होते मूल्यों का मुद्दा अब इतना पुराना हो गया है कि उस पर कुछ कहना अमूमन इतना...

सांप्रदायिक आग का कड़वा ‘धुआँ’- सत्यदेव त्रिपाठी

पिछले दिनों संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से गुलज़ार साहब की कहानी 'धुआँ' का मंचन मुम्बई के 'जुहू जागृति' हाल में हुआ। आज...

सिर्फ सानंद नहीं मरे, मरी तो उम्मीदें हैं…बिल्कुल मुर्दा जैसी…

एक ओर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चैंपियन ऑफ अर्थ का पुरुस्कार ले रहे थे तकरीबन उसी दौरान स्वामी सानंद गंगा की निर्मलता के...

‘मंटो’ : सच के आईने की त्रासदी….

मैं अपनी कहानियों को एक आईना समझता हूँ, जिसमें समाज अपने को देख सके। -और यदि सूरत ही बुरी हो, तो आईने का क्या...? -मैं सोसाइटी...