सब कुछ ओवर एक्सपोज्ड है, यही तो विकास है…

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पता नहीं ये दुर्भाग्य है या सौभाग्य कि नरेंद्र मोदी बनारस से सांसद हैं और संयोग से प्रधानमंत्री भी हैं। यानी बनारस प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है। अब जब पीएम का संसदीय क्षेत्र है और उस पीएम का जो विकास को अपनी जेब में लिए घूमता है तो ये समझना जरूरी है कि बनारस में विकास क्या हुआ।
फिर जब नरेंद्र मोदी रात के अंधेरे में शहर भ्रमण पर निकलते हैं तो कैंट स्टेशन पर लगी एलईडी लाइटों को देखते हैं। रंग बदलती लाइटें बिल्कुल राजनीति की तरह। मान लिया जाए कि नरेंद्र मोदी ने लाइटें लगवाईं तो यही विकास होगा। फिर ये मत याद रखिए कि कैंट रेलवे स्टेशन की इतनी विशाल और भव्य इमारत एक कांग्रेसी नेता ने बनवाई। चलिए आगे बढ़िए। कुछ ऐसी ही तस्वीरें गंगा पर बने राजघाट पुल की भी वायरल की जा रहीं हैं। एलईडी लाइटें लगाकर विकास का दावा किया जा रहा है। फिर मान लीजिए कि यही विकास है।
याद कीजिए तो बनारस में एक मुख्य नगर अधिकारी हुआ करते थे हरदेव सिंह। उन्होंने घाटों के किनारे ऊंची हाइमास्ट लाइटें लगवाईं। घाटों को जगमग कर दिया। हरदेव सिंह ने शहर के कई अन्य चौराहों और सड़कों पर भी ये लाइटें लगवाईं और फिर सिलसिला चल पड़ा। दरअसल हरदेव सिंह की याद दिलाने का मकसद ये बताना है कि जो काम मोदी जी के विकास के नाम पर दिखाया जा रहा है वो काम तो सालों पहले शहर का एक एमएनए करके दिखा चुका है। अब मोदी का विकास एमएनए के विकास के बराबर ही ये कहने वाला मैं कौन होता हूं।
फिर आगे चलिए तो सड़कें चमाचम और दीवारों पर पेंटिंग्स। लेकिन दिलचस्प ये है कि ये सब अमूमन मोदी आगमन से पूर्व ही होता है। आमतौर पर सड़कें गंदी और कामचलाऊ ही रहतीं हैं। फिर मान लीजिए तो डिवाइडर को रगड़ रगड़ कर चमकाया जाना ही विकास होगा।
फिर याद करिए तो गंगा किनारे न जाने कितने बरस से विदेशी पेंटिग्स बनाते रहें हैं। लेकिन कौन याद दिलाए।
मोदी जी ने तारों को अंडर ग्राउंड करा दिया ये बहुत अच्छा काम है। अब आसमान खुला खुला दिखता है। फिर याद करिए तो अटल जी की सरकार में शहरी विकास मंत्री होते थे जगमोहन। मुझे याद है कि जगमोहन जब बनारस आए तो उन्होंने सड़कों पर लगे बिजली के खंभों से लिपटा तारों का जाल देखा। वो नाराज हुए और जंक्शन बाक्स लगाने और तारों को अंडरग्राउंड करने के निर्देश दिए। हालांकि काम खासा सुस्त रहा। फिर मनमोहन सरकार और माया काल में तारों के झंझट से पुराने शहर को मुक्त करने के लिए कई फेज के तारों को एक मोटे बंडल के तौर पर लगाया जाने लगा। अच्छी योजना थी। बिजली की चोरी रुकी, तारों का जंजाल खत्म हुआ और सड़कों पर पानी भरने से पानी में करंट उतरने का डर भी कम हो गया। फिर मोदी जी ने आईपीडीएस योजना से बड़ा काम कराया लेकिन फोन के और केबिल के तारों का क्या होगा कौन बताएगा।
अब कुछ मूल सवालों पर आइए। बनारस जनपद में यूं तो कई रेलवे स्टेशन हैं पर दो मुख्य रूप से ऑपरेटिव हैं। इनमें से भी कहिए तो एक ही मुख्य रूप से ऑपरेटिव है। मोदी कोशिश करते तो कुछ नई ट्रेनें और एक नया स्टेशन दे देते तो क्या बुरा रहता। फिर चलिए ब्रिज पर। गंगा पर बना राजघाट पुल बेहद महत्वपूर्ण पुल है लेकिन दुर्भाग्य से मोदी जी ने नहीं बनवाया। उसे अंग्रेज ही बनवा कर चले गए। फिर क्या बुरा होता कि पांच सालों में इस बूढ़े पुल के बगल में एक नए पुल की नींव तक ही पड़ जाती। लेकिन नहीं हो पाया।
फिर शहर में आइए। मोदी जी ने शहर को इतना विकसित किया कि शहर हर तरफ से जाम है। क्या बुरा होता कि शहर के व्यस्त इलाकों से अतिक्रमण हटाकर वहां सड़कों को चौड़ा किया जाता या फिर फ्लाईओवरों का जाल बिछाया जाता। यहां याद दिलाना जरूरी है कि शहर में इस वक्त जो भी फ्लाईओवर हैं उनमें से अधिकतर या संभवत: सभी पिछली सरकारों की देन हैं। हां, फीता हो सकता है मोदी जी ने काटा हो। फिर क्या बुरा होता कि पांच सालों में शहर को कम से कम एक रूट पर ही सही लेकिन मेट्रो का तोहफा दे दिया जाता। जब लखनऊ में दो साल में अखिलेश मेट्रो चलवा सकते हैं तो मोदी साढ़े चार साल में बनारस में क्यों नहीं।
फिर शहर से बाहर निकलिए और मोदी जी की गोद में बैठे गांवों में चलिए। हालिया आरटीआई बताती है कि मोदी जी ने अपने गोद लिए गांवों में अपनी सांसद निधि से एक भी पैसा खर्च नहीं किया। मुझे जहां तक पता है अधिकतर काम वहां कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसबिलटी के तहत कराया गया। लेकिन याद करिए तो इस देश में आप कई गांवों की ऐसी तस्वीरें देखेंगे जहां ग्राम प्रधान की मेहनत ही उनके गांव को बेहतर बना देती है। फिर भी आप मोदी जी के गांवों को बहुत बेहतर तो नहीं कह सकते ये दावे के साथ कहा जा सकता है।

बनारस में न साफ हवा बची है और न साफ पानी। ट्रैफिक जाम, वाहनों की चिल्लपों, बेतरतीब ऑटो, बसें, रिक्शा और ऊपर से नया कोढ़ ई रिक्शा।

गंगा में गिरती गंदगी, मवेशियों का गंगा में नहलाया जाना, सीवर का ओवरफ्लो, मंदिरों का ध्वस्तिकरण या कहिए कि व्यवसायीकरण, बुनकरों की वही पुराना रोना, क्या बदला है बनारस में। फिर बनारस के पास रामनगर औद्योगिक क्षेत्र है। ये भी दुर्भाग्य से मोदी जी का बनाया नहीं है। पिछले 70 बरस के बीच में ही बन चुका था। मोदी जी कोशिश करते तो कम से कम साढ़े चार बरस में यहां एक बड़ी फैक्टरी, मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट लगवा सकते थे। हजारों लोगों को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता। चाहते तो कोई बड़ी यूनिवर्सिटी या कॉलेज प्लान कर सकते थे, कोई नया बड़ा अस्पताल बनवा सकते थे लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ। लेकिन यकीन मानिए विकास तो हुआ है। दावा यही है। शायद विकास वही हो जाता है जितना मोदी जी कर देते हैं।
फिर आखिर में एक बात गौर कीजिए मजा आएगा। मोदी जी जब अपनी एसयूवी में बैठकर रात्रि भ्रमण करते हैं तो अपनी कार की इंटरनल लाइट ऑन रखते हैं। मानों वो चाहते हों कि उनकी फोटो कम लाइट में अंडरएक्सपोज्ड न रह जाए। सब कुछ ओवर एक्सपोज्ड होना चाहिए। यही तो विकास है पगले।


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