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अब यह संकल्प लेना होगा 
इस देश में रहने वाले राजनीतिक रूप से तो आजाद हैं लेकिन मानसिक रूप से आजादी का टुकड़ा भर भी हम आज तक हम नहीं ले पाये हैं. जिन संघर्षों और आंदोलनों के सहारे हमें आजादी मिली आज हम उन्हें ही महत्व नहीं देते हैं. शहीदों की शहादत पर भी वक्त-बेवक्त प्रश्नचिह्न लगाने वाले कम नहीं हैं. इतने के बाद अगर किसी ने टोक दिया तो उसे संविधान की दुहाई दी जाती है. कहा जाता है कि संविधान में हर एक को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता है. अब जब संविधान की ही दुहाई दे दी तो कोई क्या करेगा? 
आजादी की लड़ाई लडऩे में महात्मा गांधी का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है. महात्मा गांधी और संविधान निर्माता बाबा भीमराव अंबेडकर के विचार कभी एक नहीं रहे. यहां तक की स्वतंत्रता आंदोलन में भी बाबा और बापू का मतभेद नजर आता है. कई गोष्ठियों में बाबा भीमराव ने देश में दलितों और शोषित वर्गों के लिए आंदोलन करने को ज्यादा तरजीह दी बजाए इसके कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी जाए. गांधी जी ने कई बार इसका विरोध किया. यही वजह थी बाबा और बापू आपको बहुत कम स्थानों पर ही एक साथ नजर आयेंगे. 
अंग्रेजों से जंग जीतने के बाद देश को एक संप्रभु और गणराज्य बनाने की कवायद शुरू हुई. इसके लिए आवश्यक था कि हमारे देश का अपना एक संविधान हो. इसके जिम्मेदारी सौंपी गई बाबा भीमराव अंबेडकर को. संविधान सभा ने दुनिया के कुछ पुराने और उस समय के प्रभावशाली देशों के संविधान का अध्ययन कर भारत का संविधान बना दिया. बिना किसी संदेह यह इस देश के लिए एक गौरवशाली बात थी. आजाद मुल्क का हर शख्स अब आजाद था. उसके लब आजाद थे. किसी भी विषय के बारे में बोलने की उसे पूरी स्वतंत्रता थी. शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा. बोलने वाला अपनी मर्यादा और दूसरे की इज्जत का पूरा ख्याल रखता था. धीरे-धीरे यह अनुशासन टूटने लगा. बोलने की स्वतंत्रता अब छूट का रूप लेने लगी. वक्त थोड़ा और बीता. छूट हथियार बन गई और संविधान दुहाई. बोलने वाला कुछ भी बोल कर संविधान का पर्दा डाल देता है.  चौंसठ साला आजादी अब एक ऐसी स्थिति में आ चुकी है जहां एक बार फिर से कई बातों पर विचार करने की आवश्कता है. नेता और प्रजा दोनों अब अपना-अपना राज चलाने में लगे हैं. राजनीतिक रूप से अपरिपक्वता हमारे देश को खाये जा रही है ये सही है लेकिन जनता भी कहीं से परिपक्व है ऐसा नहीं लगता है. राजनेताओं के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं. इस संबंध में नाना जी देशमुख के एक आलेख की कुछ पंक्तियां याद आती हैं कि आज इस देश में किसी राजनीतिक पार्टी में कोई नेता नहीं है बल्कि नेताओं की राजनीतिक पार्टियां हैं. अब ऐसे में नेताओं से फिलहाल कोई उम्मीद बेमानी के सिवा कुछ नहीं है. लिहाजा आइये इस 15 अगस्त हम और आप संकल्प लें कि नागरिक होने का अपना कर्तव्य हम पूरी निष्ठा से निभाएंगे. 

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  1. 15 अगस्त और 26 जनवरी के उत्सवों में अब आम जनता की रुचि लगभग समाप्त सी हो गयी है। अब यह उत्सव मनाने का ‘काम’ स्कूलों और फ़ौजियों-पुलिसवालों को सौंप दिया गया है। उनके लिए भी यह ‘उत्सव’ न होकर ‘काम’ हो गया है। शेष बचे कर्मचारियों के लिए ये दिन छुट्टी के दिन के रूप में अधिक महत्त्व रखते हैं। एक-दो दिन आगे पीछे की दूसरी छुट्टियां जुड़ जायें, तो मजे ही मजे। मजे की इस महफिल में ‘राज’ में जमे नेता और अफसर अलग ढंग से भाग लेते हैं। उनके लिए यह अपना ‘रुतबा’ दिखाने का वक्त होता है। दिल्ली से लेकर ज़िलों तक, गाँवों तक झण्डे फहराते ‘राज’ में भागीदार लोग दिखाई दे जाते हैं। उनकी उपलब्धियों के आंकड़े देश-विदेश में आजकल खूब चर्चा में है। ये आंकड़े विदेशी बैंकों में जमा धन के रूप में सामने आ रहे हैं। इन सबसे ऊब चुकी जनता ने भ्रष्टाचार को हर स्तर पर स्वीकार कर लिया है तथा सरकारी उत्सवों से मुंह मोड़ लिया है। स्वशासन का, गणतंत्र का, अपने जनपद का भाव ही नहीं है। क्या आपको यह भाव आया कि यह स्कूल, यह थाना, यह तहसील, यह कलेक्ट्रेट, यह सचिवालय, यह नेता , अधिकारी, कर्मचारी आपके अपने हैं। जैसा भाव आपके अपने मकान के प्रति है, वह अस्पताल भवन के बारे में क्यों नहीं है? तभी तो हम अस्पताल के एक कोने में थूक लेते हैं। घर में तो नहीं थूकते हैं। तभी तो नेताओं व अधिकारियों के हवाई जहाजों में घूमने पर हम आपत्ति नहीं करते हैं। हमको लगता है कि हमारा क्या, सरकार का पैसा खराब हो रहा है। तभी तो हमको देश के, प्रदेश के बजट में कोई रुचि नहीं है। योजनाओं में कोई रुचि नहीं है। हम तो 64 वर्षों के बाद भी इस बात के लिए लड़ रहे हैं कि खजाने की लूट में हमको हिस्सा कितना मिल सकता है। हिस्सा नहीं मिल रहा है, तो हम परेशान हैं। यही तो है हमारी असली परेशानी। कभी तो लगता है कि जनता उस बिगड़ैल बच्चे की तरह है जो घर के पैसे को अपनी मौज पर खर्च करने को तुला हुआ है। उसे क्या फर्क पड़ता है कि घर में पैसा कहाँ से आता है, कहाँ जाता है?
    राष्ट्रप्रेम किसी भी राष्ट्र की पहली आवश्यकता है। और वह संस्कार तथा स्वशासन से ही पनप सकता है। और इसके लिए जागृति की अभी भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी 1947 में थी। स्वशासन का भाव जगेगा, तो आम जनता का व्यवहार बदल कर रहेगा। जिम्मेदारी का अहसास बढ़ेगा। वोट देने का कारण समझ आयेगा। वोट सही भी पड़ेगा, क्योंकि अब इससे हमारा ‘नोट’ भी जुड़ गया है जो हर प्रकार के कर के रूप में हम दे रहे हैं। अभी तक जो हम ‘अमूल्य’ वोट देते आ रहे हैं, वह वाकई में अमूल्य है! उसका कोई मूल्य नहीं है! न हम उसका मूल्य समझते हैं और न हमारे नेता। लेकिन जनजागरण के बाद उसका मूल्य भी समझ में आ जायेगा।
    और शासन में बैठे लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? कई मित्र निराशाजनक बात कह सकते हैं। अजी, उन पर कहाँ असर होगा। यह प्रवृत्ति सही नहीं है। मानकर चलिए कि जब आपके अंदर बैठा ‘स्वामी’ जगेगा, तो स्वामित्व का प्रभाव सब तरफ पड़ने लगेगा। इस प्रभाव के प्रकाश में चोरियां बंद हो जायेगी। फिर आपको अनशन के चक्कर में भी पड़ने में शर्म आयेगी! आप अपनी कार के ड्राइवर के सामने अनशन करेंगे, तो मूर्खता नहीं लगेगी? कार आपकी, ड्राइवर आपने रखा है और कहते हो कि वे आपको गाड़ी में नहीं बैठा रहा है। आप अपने परिवार के साथ पैदल चल रहे हैं! और ड्राइवर मजे कर रहा है। नहीं। यह सब अब नहीं। हमारी इस बड़ी कार ‘सरकार’ के ड्राइवरों के सामने कोई बाबा या अन्ना अनशन नहीं करेंगे। हमारी आंखों में जागरण की चमक ही समाधान के लिए काफी है।

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