हमारे ‘सोशल’ होने का साइड इफेक्ट है ‘ब्लू व्हेल’ का ‘आदमखोर’ होना

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इन दिनों ब्लू व्हेल नाम के एक ऑनलाइन गेम की दहशत से पूरी दुनिया डरी हुई है। इस गेम के दिए टास्क पूरे करने के चक्कर में दुनिया भर में अब तक 130 लोगों की मौत हो चुकी है। ये गेम रशिया के एक मनोवैज्ञानिक ने ईजाद किया था। हालांकि वो इस समय जेल में है लेकिन उसका गेम आजाद है और लोगों की जान ले रहा है।

दरअसल ब्लू व्हेल में पचास दिनों में पचास टास्क दिए जाते हैं। शुुरुआती टास्क आसान होते हैं लेकिन बाद के टास्क जान लेने वाले। इस खेल में खेलने वाले को अपनी जान अनोखे तरीके से लेने का टास्क दिया जाता है। दुनिया में इसी टास्क को पूरा करते हुए 130 लोग मर चुके हैं। भारत में भी इस खेल के टास्क पूरे करते समय मौतें रिकार्ड की जा चुकी हैं। सबसे पहला मामला मुंबई में एक छात्र का सामने आया था।

इस खेल और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का आपसी तालमेल समझना जरूरी है। दरअसल हम सोशल नेटवर्किंग साइट्स की जिस आभासी दुनिया में जीने लगे हैं, मौत के इस खेल ने इसे नेटवर्किंग साइट्स के जाल को सहारा बनाया। रशिया में एक सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए इसे लोगों तक पहुंचाया गया। धीरे धीरे मौत की नेटवर्किंग होती गई और ब्लू व्हेल का आदमखोर चेहरा सामने आने लगा।

अब ये खेल पूरी दुनिया में पहुंच चुका है और कई देशों ने इसे प्रतिबंधित भी कर दिया है। भारत में भी ये खेल पहुंच चुका है और अपना शिकार बना रहा है। भारत के बदलते सामाजिक परिवेश में ब्लू व्हेल जैसी बीमारियों के खतरे कई गुना बढ़ जाते हैं। एकाकी परिवार की परंपरा की ओर बढ़ चले भारतीय समाज के पास अपने युवाओं और बच्चों के लिए वक्त नहीं होता। बड़े शहरों की जीवनशैली में मां बाप और बच्चों का आमना सामना रात में सोते समय ही हो पाता। ये समाजिकता के खत्म होते दौर की आहट है। हां, ये सामाजिकता खत्म हो जाएगी लेकिन लोग सोशल हो जाएंगे। हमारा युवा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मौजूद रहेगा लेकिन समाज में नहीं।

हालांकि इस दौर में सोशल नेटवर्किंग साइट्स के फायदों को दरकिनार भी नहीं किया जा सकता है और ना ही उनसे मुंह मोड़ा जा सकता है लेकिन इतना जरूर है कि सोशल होने और सामाजिक होने का अंतर समझ लिया जाए। वरना इसी तरह ब्लू व्हेल आती रहेंगी और हमारे बच्चों को अपना निवाला बनाती रहेंगी।

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