सुकमा को बचा लीजिए, हमारे जवान भी बच जाएंगे

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maoistsसुकमा में 25 जवानों की शहादत की खबर को यूं ही सुन कर भूल जाना संभव नहीं होता। आप इंसानी रिश्तों को भावुकता से जीते हैं तो आपके नथुनों में बारुद के साथ घुली इंसानी मांस की गंध भऱने लगती है। आप आंखे खोलकर कर भी कुछ देखना नहीं चाहते हैं। आपके पास सिर्फ लाशें होती हैं। इन हालातों में इतना गुस्सा मन में भर जाता है कि आंसुओं को निकलने की सहूलियत नहीं बचती है। हां, हम भारतीय हैं लिहाजा धैर्यवान तो होंगे ही लिहाजा देश के गृह मंत्री अगर इतना भी कह दें कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा तो भी हम चुपचाप बैठ जाते हैं।

आप और हम कर भी क्या सकते हैं। हो सकता है कि सरकार कोशिश कर रही हो लेकिन सफल नहीं हो पा रही हो, हो सकता है कि हम सरकार से कहीं अधिक उम्मीद कर रहें हों। लेकिन इस सबके बीच समस्या जस की तस खड़ी ही रहती है। समस्या के प्रति हमारा मूल रवैया नहीं बदलता। हम समस्या को समस्या को तौर पर ही देखना चाहते हैं।

मेरा अपना मानना है कि नक्सल समस्या का हल बंदूक से नहीं निकल सकता। अगर बंदूक से हल निकलता तो ना तो नक्सलियों के पास बंदूकों की कमी है और ना ही अर्धसैनिक बलों के पास। इन दोनों के ही पास भरपूर बंदूकें और बारूद है लेकिन समस्या का हल तो नहीं है।

इस देश में तकरीबन 11 करोड़ आदिवासी हैं। देश की ये आबादी जीवन को बस जी भर रही है। देश में सुकमा जैसी खबरों के बाद जवानों की मौत के मातम के बीच इन 11 करोड़ लोगों का शोक दब कर रह जाता है। 2011 की जनगणना बताती है कि देश में तकरीबन 8.61 फीसदी आदिवासी हैं और देश के 15 फीसदी भूभाग पर स्थापित हैं। इस तरह देखा जाए तो हर तेरहवां शख्स आदिवासी है। तकरीबन 52 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करते हैं। जल, जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों के सहारे जिंदगी गुजर बसर करने वाली इस आबादी के पास पीने का साफ पानी भी नहीं है। ये वही लोग हैं जो जंगल को जंगल बना कर रखते हैं। हमारे लिए विकास की जो परिभाषा है वो इनके पैमानों पर खरी नहीं उतरती।

सुकमा में जवानों की शहादत हमें अंदर तक झकझोर देती है। हम दिन दो दिन, हफ्ते दो हफ्ते के लिए हर नक्सली को मार देने की सोच लिए सोते जागते हैं। लेकिन इस सबके बीच हमारे मन में सुकमा जैसे इलाकों में रहने वाले आदिवासियों के बारे में ख्याल नहीं आते। हमें अपने जवानों को बचाना है तो पहले सुकमा को बचाना होगा।

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