सियासत के लिए उर्वरा भूमि पर नई उपज हैं अखिलेश यादव, खाद पानी के साथ, अभी लहलहाते रहेंगे।

217

akhi-foot

उत्तर प्रदेश ने जिस क्षेत्र में सबसे अधिक विकास किया है वो है राजनीति। साल दर साल यूपी की जमीन राजनीतिक लिहाज से पहले से कहीं अधिक उर्वरा होती जा रही है इसमें अब शक की वजह नहीं दिखती। अखिलेश यादव का राजनीतिक पदार्पण इतनी तेजी से हुआ कि खुद अखिलेश यादव को इसकी उम्मीद नहीं थी। रथयात्राओं के जरिए किसी भी रूप में इतने बड़े बहुमत के साथ सरकार बनाना मुश्किल था। जाहिर है कि अखिलेश के व्यक्तित्व के सहारे ही राज्य में सपा की वापसी हो पाई।

किसी भी राजनीतिक पार्टी की पारंपरिक छवि को तोड़ पाना बेहद मुश्किल काम होता है। हालांकि अखिलेश ने ये काम कर दिखाया। अपने मुख्यमंत्रित्वकाल के शुरुआती चरणों में उसी पुरानी छवि से जूझने के बाद अखिलेश ने नया कलेवर पार्टी को दिया। बहुत हद तक सपा को गुंडो की पार्टी वाली छवि से बाहर लाकर अखिलेश ने विकास का नारा ही नहीं दिया बल्कि कर भी दिखाया। शासन के शुरुआती चरण में मुजफ्फर नगर के दंगे का कलंक लगने के बाद अखिलेश राजनीतिक रूप से परिपक्व हुए और देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता को संभालना सीख गए।dsc_0119

हालांकि इस दौरान अखिलेश अपनी पार्टी के पुराने चेहरों से एक संघर्ष की स्थिती में भी लगातार दिखते रहे। हैरानी यही रही कि राजनीतिक रूप से मायावती ने जितनी चुनौतियां अखिलेश के सामने नहीं खड़ी कीं उससे कहीं अधिक उनके पिता और पिता के सहयोगी करते रहे।

भले ही चुनाव के दौरान सपा में वर्चस्व की एक जंग चल रही हो लेकिन इस बात से हर शख्स इत्तफाक रख रहा है कि अखिलेश ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक रूप से एक नई लकीर खींच दी है। इस लकीर के दाएरे में विकास है। पत्थरों के पार्क नहीं हैं, सांप्रदायिक विभाजन नहीं है, भ्रष्टाचार तुलनात्मक रूप से कम है।

अखिलेश नई धारा की राजनीति के ऐसे वाहक के तौर पर उभरे हैं जो लोकतंत्र में अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहता। वैश्विक विकास के पैमानों की समझ रखने वाले अखिलेश में सुधार की गुंजाइश तो बहुत बची है लेकिन इसके साथ ही उम्मीद भी है कि अखिलेश जात पात, धर्म संप्रदाय, क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर काम करने की कोशिश कर तो सकते ही हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here