शहीद की पत्नी ने पति की जैकेट नहीं धोई ताकि उसे पहन कर पति को महसूस कर सके

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देश की सरहदों पर हर पल निगहबानी करने वालों की मौत ना सिर्फ उनकी जिंदगी खत्म करती है बल्कि एक ऐसा शून्य उनके परिवार में भर जाती हैं। हम लाख मुआवजे दे लें लेकिन ऐसे शून्य को भर नहीं सकते। हम और आप जिनके घर में कोई सेना का नहीं है, कोई सीमाओं पर शहीद नहीं हुआ, ऐसे लोग तो मानों शहीदों के परिवार वालों के लिए शहीदों की शहादत का दुख कुछ खास मौके तक ही सीमित रहता है। लेकिन शहीदों के परिवार वाले मानों हर रोज तिल तिल उसकी याद में मरते हैं। हम ये बातें आज इसलिए कर रहें हैं कि एक शहीद की पत्नी ने अपने दर्द में पूरे देश को शामिल कर लिया है।

संगीता अक्षय गिरीश नाम की इस महिला के पति सेना में थे और एक आतंकी हमले में शहीद हो गए। संगीता बताती हैं कि कैसे उनका छोटा सा ख़ुशहाल परिवार आने वाली अनहोनी से अंजान था। उनकी तीन साल की बेटी के सिर से पिता का साया उठ चुका है। एक साल पहले उन्होंने अपने पति को खो दिया था, आज उनके पास अक्षय की यादें हैं. उन्हीं यादों के पिटारे से कुछ यादें उन्होंने यहां बिखेर दी हैं।

संगीता ने ये सबकुछ अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है। संगीता के मुताबिक, 2009 में उसने मुझे प्रपोज़ किया था. 2011 में हमारी शादी हुई, मैं पुणे आ गयी। दो साल बाद नैना का जन्म हुआ। उसे लम्बे समय तक काम के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता था। हमारी बच्ची छोटी थी इसलिए हमारे परिवारों ने कहा कि मैं बेंगलुरु आ जाऊं. मैंने फिर भी वहीं रहना चुना जहां अक्षय था। मैं हमारी उस छोटी सी दुनिया से दूर नहीं जाना चाहती थी जो हमने मिल कर बनायी थी।

                                                उसके साथ ज़िंदगी हंसती-खेलती थी. उससे मिलने नैना को लेकर 2011 फ़ीट पर जाना, स्काईडाइविंग करना, हमने सबकुछ किया।

2016 में उसे नगरोटा भेजा गया. हमें अभी वहां घर नहीं मिला था, इसलिए हम ऑफ़िसर्स मेस में रह रहे थे. 29 नवम्बर की सुबह 5:30 बजे अचानक गोलियों की आवाज़ से हमारी आंख खुली. हमें लगा कि ट्रेनिंग चल रही है, तभी ग्रेनेड की आवाज़ भी आने लगी. 5:45 पर अक्षय के एक जूनियर ने आकर बताया कि आतंकियों ने तोपखाने की रेजिमेंट को बंधक बना लिया है. उसके मुझसे आखरी शब्द थे “तुम्हें इसके बारे में लिखना चाहिए”.

सभी बच्चों और महिलाओं को एक कमरे में रखा गया था. संतरियों को कमरे के बाहर तैनात किया गया था, हमें लगातार फ़ायरिंग की आवाज़ आ रही थी. मैंने अपनी सास और ननद से इस बीच बात की. 8:09 पर उसने ग्रुप चैट में मेसेज किया कि वो लड़ाई में है.

                                                                                 sangeeta akshay girish

8:30 बजे सबको सुरक्षित जगह ले जाया गया. अभी भी हम सब पजामों और चप्पलों में ही थे. दिन चढ़ता रहा, लेकिन कोई ख़बर नहीं आ रही थी. मेरा दिल बैठा जा रहा था. मुझसे रहा नहीं गया, मैंने 11:30 बजे उसे फ़ोन किया. किसी और ने फ़ोन उठा कर कहा कि मेजर अक्षय को दूसरी लोकेशन पर भेजा गया है।
लगभग शाम 6:15 बजे कुछ अफ़सर मुझसे मिलने आये और कहा, “मैम हमने अक्षय को खो दिया है, सुबह 8:30 बजे वो शहीद हो गए.” मेरी दुनिया वहीं थम गयी. जाने क्या-क्या ख़याल मेरे मन में आते रहे. कभी लगता कि काश मैंने उसे कोई मेसेज कर दिया होता, काश जाने से पहले एक बार उसे गले लगा लिया होता, काश एक आखिरी बार उससे कहा होता कि मैं उससे प्यार करती हूं।
चीज़ें वैसी नहीं होतीं, जैसा हमने सोचा होता है. मैं बच्चों की तरह बिलखती रही, जैसे मेरी आत्मा के किसी ने टुकड़े कर दिए हों. दो और सिपाही भी उस दिन शहीद हो गए थे. मुझे उसकी वर्दी और कपड़े मिले. एक ट्रक में वो सब था जो इन सालों में हमने जोड़ा था. लाख नाकाम कोशिशें कीं अपने आंसुओं को रोकने की।

आज तक उसकी वर्दी मैंने धोयी नहीं है। जब उसकी बहुत याद आती है, तो उसकी जैकेट पहन लेती हूं। उसमें उसे महसूस कर पाती हूं।

शुरू में नैना को समझाना मुश्किल था कि उसके पापा को क्या हो गया, लेकिन फिर उससे कह दिया कि अब उसके पापा आसमान में एक तारा बन गए हैं। आज हमारी जमायी चीज़ों से ही मैंने एक दुनिया बना ली है, जहां वो जीता है, मेरी यादों में, हमारी तस्वीरों में। आंखों में आंसू हों, फिर भी मुस्कुराती हूं। जानती हूं कि वो होता तो मुझे मुस्कुराते हुए ही देखना चाहता। कहते हैं न, अगर आपने अपनी आत्मा को चीर देने का दर्द नहीं सहा तो क्या प्यार किया। दर्द तो बहुत होता है पर हां, मैं उससे हमेशा इसी तरह प्यार करूंगी।”

 

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