माटुंगा की खुशी बांटी जाए, फिर खुशी बढ़ाने की सोची जाए

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महाराष्ट्र का माटुंगा रेलवे स्टेशन हाल में पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में दे दिया गया। ये देश का ऐसा पहला रेलवे स्टेशन है जिसकी सभी व्यवस्थाएं महिलाओं के हाथ में होंगी। स्टेशन में गाड़ियों के आने जाने के समय के एनाउंसमेंट्स से लेकर यात्रियों के टिकट चेक करने तक के सभी काम महिलाओं के ही जिम्मे हैं। स्टेशन का कंट्रोल रूम भी महिलाएं संभालती हैं। टिकट काटने का काम भी महिलाओं के ही जिम्मे है। ये एक सुखद एहसास है।

जिस देश में बच्चियों को गर्भ में मारने की प्रवृत्ति भी समाज में व्याप्त हो उसी देश में जब ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं तो किसी को भी सुखद एहसास स्वाभाविक है। माटुंगा को दिमाग में जब हरियाणा का ख्याल आता है तो मानों दिल ये सोचने को मजबूर हो जाता है कि यदि वहां गर्भ में मरने वाली बच्चियों को बचा लिया जाता तो शायद वो भी किसी ‘माटुंगा’ को संभाल रहीं होती।

देश में महिला और पुरुषों में कई स्तरों में असंतुलन है। बच्चियों के साथ भेदभाव मां के गर्भ में ही शुरु हो जाता है। बच्चियों की स्कूलिंग का हाल भी देश में बुरा है। आंकड़े देने की आवश्यकता नहीं है। ये अब इतना गूढ़ विषय भी नहीं रहा है कि समझाना पड़े। स्कूलिंग में भेदभाव की वजह से मेल फिमेल के लिट्रेसी रेट में भी खासा अंतर है। स्वास्थय सुविधाओं से लेकर सामान्य रहन सहन में भी बेटियां भेदभाव का शिकार रहती हैं।

हालांकि खुशी की बात ये है कि हालात में बदलाव हो रहें हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक सन 2016 में 144 देशों में बने वैश्विक जेंडर गैप इंडेक्स में भारत का क्रमांक 87 है। भारत की रैंकिंग में लगातार सुधार हो रहा है।

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जेंडर गैप इंडेक्स हर देश में महिलाओं और पुरुषों के बीच चार तरह के अंतर पर आधारित होता है. ये हैं आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा प्राप्ति, स्वास्थ्य एवं अस्तित्व, और राजनीतिक सशक्तिकरण. इन चार कसौटियों में राजनीतिक सशक्तिकरण को छोड़कर भारत का प्रदर्शन बाकी तीन क्षेत्रों में बहुत खराब रहा है।

फिर भी स्थितियां सुधर रहीं हैं और हमारे लिए वाया माटुंगा ये खबर पहुंच भी रही है। लेकिन ये निश्चित है कि समाज में जागरुकता का बहुत कम हिस्सा ही आया है। अभी प्रयास और संघर्ष की लंबी कहानी सुननी देखनी बाकी है। हमें अभी कई और माटुंगा बनाने हैं।

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