पकड़ सौ की पत्ती और बोल अन्ना जिंदाबाद

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सुनने में यह अजीब लगता है लेकिन बात है सही। यह मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं। अगर देश में इसी तरह से अन्ना की आंधी चलती रही तो आने वाले समय में अन्ना ईमानदारी के प्रतीक होंगे और बेइमानी को छुपाने का जरिया। रैलियों और सभाओं के ठेकेदार अन्ना के नाम पर नारा लगाने वालों की फौज रखेंगे। उन्हें एक पॉउच और सौ की पत्ती पकड़ा कर नारे लगवायेंगे। ठीक वैसे ही जैसे आज गांधी, सुभाष, आजाद, अंबेडकर के लिए लगाये जाते हैं। न तो नारे लगाने वालों को इससे कोई मतलब होगा कि वो किसके लिए और क्यों नारे लगा रहे हैं और न ही इन नारों को सुनने वालों को कोई फर्क पड़ेगा। एक संवेदनहीनता का जन्म हो जायेगा। आज सरकारी कार्यालयों में महात्मा गांधी की फोटो टंगी होती है और टेबुल के नीचे से लेन-देन होता रहता है। कुछ दिनों बाद गांधी की तस्वीर के बगल में मुस्कुराते अन्ना की भी तस्वीर होगी और हम और आप में से कोई एक टेबुल के नीचे से अपनी फाइल पार करा रहा होगा। 

यह ठीक है कि अन्ना के समर्थन में पूरा देश एक हो गया है। लेकिन यह भी सच है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मन में गुस्सा अन्ना के लिए प्यार से अधिक है। इसके साथ ही एक अहम मुद्दा यह भी है कि हम कितने बदल रहे हैं। अगर हम भ्रष्टाचार को हटाना चाहते हैं तो बदलाव अपने भीतर भी तो लाना होगा। एक दिन के नारे से कहीं अधिक जरूरी है साल भर की व्यक्तिगत ईमानदारी। बिजली के बिल से लेकर रेलवे के टिकट तक में हम अपना काम सुविधा शुल्क के जरिए करवाने के आदती हो गये हैं। सिविल सोसाइटी का सिविक सेंस जब जागता है तो हम गवर्नमेंट पर ही आरोप मढ़ देते हैं। कह देते हैं कि सरकारी कर्मचारी लेते हैं तो हम देते हैं। क्यों नहीं हम अपना काम कराने से मना कर देते हैं। करप्शन को आश्रय हम नहीं देते हैं ? 
अन्ना का सच्चा समर्थन करना है तो प्रण कीजिए कि न तो भ्रष्टाचार सहेंगे और न ही उसके भागीदार बनेंगे। भले ही आपका बच्चा कम अनुपस्थिती के कारण परीक्षा न दे पाये लेकिन आप घूस न देकर एक इम्तिहान जरूर पास कर लेंगे। अगर ऐसा नहीं कर पा रहे तो चुपचाप घर पर बैठ जाइये और मत दावा करिए कि आप इस देश को एक नयी दिशा देना चाहते हैं।

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