जो किसान मर गए वो कांग्रेसी थे, जो बचे हैं वो अपनी पार्टी तय कर लें

    2381

    हैरानी होती है। किसानों के मसले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए लेकिन राजनीति के सिवा कुछ हो भी नहीं रहा है। विडंबना ये कि किसानों की आत्महत्याओं को सत्ता का मुखिया संदेह की दृष्टि से देखता है और विपक्ष एक राजनीतिक अवसर के तौर पर। भारत के अधिकतर प्रदेशों में किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं की प्रवृति ने अब उत्तराखंड को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। राज्य में किसानों की आत्महत्याओं और बैंक की नोटिसों के सदमे से मरने के कम से कम 6 मामले सामने आ चुके हैं।

    विडंबना देखिए कि सरकार पहले तो ये मानने को ही तैयार नहीं होती है कि मरने वाले किसान भी थे, आलोचनाओं की दीवार जब ऊंची हो जाती है तो सुसाइड नोट ना छोड़े जाने की खिड़की खोल कर अपनी जगह बना ली जाती है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि मरने वाले ने सुसाइड नोट नहीं छोड़ा लिहाजा आत्महत्या करने पर मुहर नहीं लगाई जा सकती।

    किसानों की आत्महत्या और सियासत के बयानों में मानों एक अन्तर्विरोध नजर आता है। सरकार मानों किसानों की आत्महत्या को जबरन अस्वीकार कर देना चाहती हो। मौत भी संवेदनाएं भी व्यक्त करने में हिचक महसूस करती है सरकार। अगर करनी ही पड़ी तो उसके लिए प्रशासन की जांच का इंतजार किया जाता है।

    उत्तराखंड में मरने वाले किसान मानों कांग्रेस पार्टी के थे क्योंकि भाजपा का कोई नेता इन मरने वालों के घर संवेदना व्यक्त करने तक नहीं पहुंचा। जो किसान राज्य में बचे हैं उन्हें पहले अपनी पार्टी तय कर लेनी चाहिए।

    उत्तराखंड में किसानों की मौत से आंख चुराने की कोशिशों में लगी सरकार को शायद गोधरा कांड के समय नरेंद्र मोदी को राजधर्म पालन की अटल जी की नसीहत याद दिलाने का समय आ गया है। हालांकि वो नसीहत सांप्रदायिक दंगों को लेकर थी लेकिन किसानों की आत्महत्या की भयावहता उससे कम नहीं है। कम से कम सरकार के मुखिया को ये समझना पड़ेगा कि ये सरकार सिर्फ एक पार्टी की सरकार नहीं है, ये पूरे राज्य की सरकार है।

     


    Warning: mysqli_query(): (HY000/1030): Got error 28 from storage engine in /home/agnadfadfivaarta/public_html/wp-includes/wp-db.php on line 1938

    1 COMMENT

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here