गंगा में रेत के टीले

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देव नदी गंगा को लेकर मेरी चिंता बढती जा रही है.कम से कम बनारस की जो स्तिथि मैं देख रहा हूँ वोह इस गंगा की दुर्दशा को साफ़ बयां करता है-लेकिन अफ़सोस की बात है की इस तरफ़ जितना ध्यान होना चाहिए उतना है नही…..गंगा में रेत के टीले निकल आयें हैं…गंगा की छाती पर निकले यह बड़े बड़े टीले गंगा को मिले घाव की तरह हैं……दरअसल गंगा के प्रवाह से हुए छेड़छाड़ और अत्यधिक पानी निकाले जाने से गंगा की यह दुर्दशा हो है….बात बनारस की ही ले ली जाए तो गंगा की हालत समझ में आ जायेगी….गंगा बनारस में जैसे ही प्रवेश कर रही है वहां पर गंगा मुडती है….यहाँ गंगा का प्रवाह बिना किसी बाधा के होना चाहिए था लेकिन यहाँ बना दिए गएँ पुल हैं…एक पुल तो बन चुका है और दूसरा अभी निर्माणाधीन है..इन दो पुलों के कारन गंगा का प्रवाह बाधित हो रहा है..नतीजा गंगा में आने वाला बालू यहाँ पर आकर इकट्ठा होता जा रहा है…बालू यह टीले अब बेहद बड़ा आकर ले चुके हैं..इन टीलों ने गंगा की धारा को दो भागों में बाँट दिया है…..अपने पुराने घाटों से गंगा लगातार दूर होती जा रही है….अब बनारस के बेहद महत्वपूर्ण और प्रशिध घाट को ही ले लीजिये….यहाँ गंगा अपने घाट से एक लगभग पचास मीटर दूर हो चुकी है साथ ही यहाँ गंगा कम गहरी हो गई है….यह महज एक घाट की कहानी नही है यह कहानी बनारस के लगभग सभी घाटों की है….बालू के टीले लगातार निकल रहें और गंगा का प्रवाह हर रोज़ रुक रहा है..लेकिन इस देश में ऐसा कोई भी नज़र नही आता जो गंगा के लिए आगे आकर कुछ कर सके…

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