कुछ उधार के मौसम ले आयो..

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कुछ उधार के मौसम ले आयो..
बहुत दिन हुए
यहाँ कोई मौसम नहीं आया….
ना कभी जेठ कि दोपहर से बचने के लिए
किसी नीम का सहारा लिया…..
ना कभी बारिश में भीगने को
मैदान में नंगे पाँव दौड़ा
खुले आकाश से सीधे बदन पर
पड़ती बूंदों क स्पर्श
भूल सा गया हूँ..
ठिठुरती ठण्ड में आज भी
आग के सामने बैठने क़ा मन करता है
बहुत दिनों से एहसास नहीं किया
उन हवायों को
जिनके बीच हर दर्द
दूर हो जाता है
क्या वोह भी मुझे याद करती होंगी
क्या बूंदों को भी अच्छा लगा होगा स्पर्श मेरा
यह पूछना है मुझे उनसे
जायो उधार ही सही लेकिन
कोई मौसम ले आयो………

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