ऑक्सीजन की कमी से उनके बच्चे मरे थे, कैसे बताऊं कि देश बुलेट ट्रेन में बैठेगा?

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अगर आप एक इंसान हैं तो बच्चों की मौतें आपको अंदर तक झकझोर कर रख ही देंगी। हो सकता है कि आप कुछ कम भावुक हों तो आपको 60 बच्चों की पहले गोरखपुर में मौत और फिर फरुखाबाद में 14 बच्चों की मौतें कुछ कम सदमा पहुंचाएंगी और आप अगर कुछ अधिक भावुक होंगे तो ये मौतें आपके जेहन में सदा के लिए बैठ भी जाएंगी। देश में एक नई क्रांति का सूत्र पात हुआ है और भारत में बहुतायत इसका जश्न मना रहें हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होंगे या फिर मैं अपने को शामिल कर लूं तो हैं ही जो बुलेट ट्रेन जैसी व्यवस्थाओं से उतने बड़े पैमाने पर खुश नहीं होते जितना होना चाहिए। जिस देश के अस्पतालों में बच्चे ऑक्सीजन की कमी से मर जाएं उस देश के लिए बुलेट ट्रेन का सपना देखना कितना सही है ये समझना मुश्किल है।

बुलेट ट्रेन का चलाया जाना देश के लिए एक बेहतर खबर हो सकती है लेकिन ऐसी खबरों के ढेर पर नहीं जहां देश में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों के मरने की खबरें पहले से भरी हों। 2017 – 18 के लिए केंद्र सरकार ने स्वास्थ सेवाओं के लिए 48, 853 करोड़ रुपए का बजट जारी किया है। ये बुलेट ट्रेन की लागत का आधा भी नहीं है।

                                                                         health budget

आपको एक तथ्य और जानना जरूरी है। गोरखपुर के जिस बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत हुई उस कॉलेज को 2016-17 के लिए तकरीबन 16 करोड़ रुपए का फंड दिया गया था। 2017-18 के लिए ये फंड कम करते हुए सरकार ने 7.8 करोड़ कर दिया। मशीनों और अन्य उपकरणों के लिए दिए जाने वाले फंड को सरकार ने 75 फीसदी तक कम कर तीन करोड़ से 75 लाख रुपए कर दिया। बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 955 बेड्स हैं और इसमें से 150 बेड्स को आपातकाल में वेंटिलेटर की सुविधा से युक्त रखा गया है। हिसाब लगाएंगे तो सरकार ने जो फंड दिया है वो तकरीबन 152.62 रुपए प्रति बेड आएगा। ये तथ्य मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले सें हैं।

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पिछले कुछ दिनों में भारतीय रेलों पर दबाव बहुत तेजी से बढ़ा है। नई ट्रेने चलाए जाने और पटरियों का रखरखाव ठीक से न होने की वजह से देश में रेल हादसों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। हालांकि इस बीच तथ्य यही है कि केंद्र सरकार ने 2017 -18 में रेल यात्रियों की सुरक्षा, ट्रेनों में साफ सफाई के लिए कुल तकरीबन एक लाख करोड़ का बजट रखा है। यानी यात्रियों की सुरक्षा पर होने वाला खर्च बुलेट ट्रेन की कीमत का तकरीबन आधा मान सकते हैं।

देश में बुलेट ट्रेन चलाए जाने को गलत नहीं कहा जा सकता लेकिन इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता है कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थानों में बच्चे महज साठ लाख के बकाया की वजह से मर जाते हैं। 1978 से हम जापानी इंसेफ्लाइटिस से जूझ रहें हैं लेकिन बावजूद इसके हम इस रोग का इलाज नहीं कर पाएं हैं। विकास के दावों की सुनहरी किताब के बीच एंबुलेंस ना मिलने से कांधे पर पत्नी की लाश ढूंढ़ते शख्स का चेहरा बदनुमां धब्बा सा लगता है। अब ऐसे में आप ही तय कीजिए कि बुलेट ट्रेन चलने की खबर उन परिवारों को कैसे दी जाए जिनके बच्चे गोरखपुर से लेकर फरुखाबाद तक ऑक्सीजन की कमी से मर गए?

 

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