इसी भारत में महिलाओं को माहवारी की छुट्टी भी मिलती है और यहीं सेनेटरी पैड भी मयस्सर नहीं

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हम जिस दौर में जी रहे होते हैं उसे अपने ही अतीत से हमेशा बेहतर मानते हैं। ये एक साधारण सामाजिक अवधारणा है। ऐसा हमेशा हो ये जरूरी नहीं है। देश में महिलाओं की स्थिती विडंबनाओं से भरी है। पता नहीं पहले भरी थी या नहीं लेकिन फिलहाल तो भरी ही है। समाज में गैरबराबरी से जूझती भारतीय महिलाओं के लिए अपनी दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए ना जाने कितने पैबंद चिपकाने पड़े।

भारतीय समाज में महिलाओं की माहवारी या पीरियड्स को लेकर भी विडंबनाएं असीमित हैं। पीरियड्स के समय महिलाएं अछूत हो जाती हैं। ये 21वीं सदी का ही जिक्र हो रहा है। वही दौर जब आप अपने अतीत से अपने वर्तमान को बेहतर और आधुनिक बता रहें हैं। उसी दौर में महिलाएं महीने के पांच दिन पूजा घर में नहीं जा सकती। जरूरी ना हो तो रसोईघर में भी जाने की मनाही ही है। ऐसा नहीं है कि ये अवधारणा नई हो। हालांकि कितनी पुरानी है ये तो बताना मुश्किल है लेकिन सदियों पुरानी है। अफसोस इस बात का है इस दौर में ये समाज में व्याप्त ही है।

गुजरा दौर हमेशा अधिक कुरितियों को ढोता रहा हो ये जरूरी नहीं है।  कभी कभार कहानी इसके उलट भी होती है।  केरल के तिरुवनंतपुरम में एक स्कूल है। त्रिपुनिथरा इलाके के इस सरकारी गर्ल्स स्कूल में परिक्षाओं के दौरान माहवारी की बाकायदा छुट्टी दी जाती है। ये छुट्टी आज से नहीं सन 1912 से दी जा रही है। दरअसल उस वक्त इस स्कूल में 300 दिनों की उपस्थिति अनिवार्य थी। नियमित कक्षाओं में छात्राओं की उपस्थिती भी जरूरी थी। अक्सर छात्राएं पीरियड्स के समय अनुपस्थित हो जाती थीं। ये समस्या परीक्षाओं के समय भी आती। ना सिर्फ छात्राएं बल्कि महिला टीचर्स भी अनुपस्थित रहतीं। इतिहासकार पी भास्करानुन्नी की लिखी किताब ‘केरला इन द नाइन्टीन्थ सेंचुरी‘ के मुताबिक स्कूल प्रिंसिपल ने अाला अधिकारियों से बात की और माहवारी के दिनों में छुट्टी देने का अनुरोध किया। स्कूल निरिक्षक ने समस्या की गंभीरता को समझा और पीरियड्स के समय छुट्टी स्वीकृत कर दी। परीक्षाओं के दौरान भी माहवारी की छुट्टी दी जाती और परीक्षा से छूटी छात्राओं की बाद में परीक्षा ली जाती। केरल के इस स्कूल में ये नियम आज भी लागू है। यहां ये समझना जरूरी है कि ये छुट्टी छात्राओं और महिला शिक्षिकाओं की सहुलियत को देखते हुए लिया गया।

ये एक समाज की अपनी ही वर्जनाओं कि गिरफ्त से आजाद होने की कोशिशों की गवाही थी।

अब दूसरा पहलु समझिए। भले ही इसी भारत के एक हिस्से में एक स्कूल ने पीरियड्स के लिए छुट्टी देनी आज से सौ साल पहले ही शुरू कर दी लेकिन इन बीते सौ से अधिक सालों में हम भारतीय महिलाओं को सेनेटरी पैड्स नहीं उपलब्ध करा पाएं हैं। पीरियड्स के दौरान महिलाओं के लिए हाइजीन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। सेनेटरी पैड्स इसमें मदद करते हैं लेकिन ये मदद बेहद सीमित है। देश की तकरीबन 70 फीसदी महिलाओं को सेनेटरी पैड्स उपलब्ध नहीं हैं। शहरी इलाकों में महिलाएं सेनेटरी पैड्स का प्रयोग करती हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में महिलाएं महीने के उन पांच दिनों में कपड़े से ही काम चलाती हैं। ये कपड़े महिलाओं को कितना बीमार करते हैं ये बताने की जरूरत नहीं है। ये हमारे समाज की अजीब विडंबना है। हम टुकड़ों में तरक्की कर रहें हैं। महिलाएं मानों इन टुकड़ों का कम ही हिस्सा पाती हैं।

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