इरोम शर्मिला तुम जब मर जाओगी तो हम फूल चढ़ाएंगे, गोष्ठियां करेंगे लेकिन अभी माफ करो।

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ब्रिटेन के पत्रकार जान टेलर ने 1969 में कहा था कि भारत एक अस्वाभाविक राष्ट्र है। जान टेलर एक ब्रिटिश पत्रकार थे और भारतीय समाज के अच्छे जानकार भी। आजादी के बाद के भारत को उन्होंने करीब से देखा था।

जान टेलर की कही बातों को लोकतंत्र के लिहाज से परखा जाए तो आज के परिदृश्य में सटीक बैठती नजर आती हैं।

मणिपुर में हुए विधानसभा चुनावों में इरोम शर्मिला का हार जाना मानों इस देश के अस्वाभाविक लोकतंत्र की भी दुहाई देता है। इरोम का नाम आते ही हमें अस्पताल के बेड पर लेटी एक लाचार महिला का चेहरा याद आता है। इरोम के चेहरे को देखने के बाद 16 साल का उनका संघर्ष भी याद आता है। हम भारत के आम नागरिक जिस गुस्से और क्रोध को दबाकर पूरा जीवन जी लेते हैं इरोम ने उस नाराजगी को बेहद संयमित रूप से पूरे सोलह सालों तक व्यक्त किया। इरोम को देश के संविधान में, कानून में, संसद में, हर संवैधानिक संस्था में भरोसा पूरी तरह था। इरोम शायद सोचती होंगी कि सोलह साल तक वो गांधी वादी रूप से लड़ती रहेंगी तो देश में क्रांति आ जाएगी, देश सड़कों पर आ जाएगा और देश में उस आर्मड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट के खिलाफ एक सशक्त विचारधारा प्रबल हो जाएगी जिसके खिलाफ वो सोलह सालों तक अस्पताल के एक कमरे में बनी अस्थायी जेल में पड़ी रहीं।

इरोम ने महज शक के आधार पर भारतीय फौजियों को इंफाल में उनके शब्दों में नरसंहार करते देखा। आर्मड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट सशस्त्र बलों को बिना वारंट के तलाशी लेने और बल प्रयोग की छूट देता है।

इरोम की इच्छा तो मणिपुर का सीएम बनने की थी लेकिन मणिपुर के जनादेश में उनके लिए विधायक तक की कुर्सी नहीं है।

भारत एक अस्वाभाविक लोकतंत्र है ये कहना गलत नहीं होगा क्योंकि इस देश में 20 लोगों की हत्या की दोषी फूलन देवी पूरे जनादेश के साथ दो बार संसद में पहुंची। हालांकि इस बहाने ना इरोम को बंदूक उठाने की सलाह दी जा सकती है और ना ही फूलन के बंदूक उठाने को जायज करार दिया जा सकता है।

हम जिस लोकतंत्र के सौन्दर्य पर गौरवान्वित होते हैं वो गर्व इरोम के मामले में नाराजगी में बदल जाता है।

इरोम के गांधी वादी तरीके की बात होती है तो गांधी की बात भी जरूरी है। इरोम की हार ने सवाल उठाया है कि क्या देश में गांधी और गांधीवाद के दिन अब खत्म होने लगें हैं? क्या बंदूकें लोकतंत्र के पहरुओं की प्रहरी से अब लोकतंत्र में हिस्सेदारी का रास्ता भी बन गईं हैं। हो सकता है ये एक सामान्य अवधारणा के तौर पर न लिया जा पाए लेकिन अपवाद में तो सही ही है। आज हम सब गांधी की मूर्तियों पर फूल चढ़ाते हैं लेकिन उस गांधी को अपने भीतर नहीं उतारना चाहते। हमें गांधी नहीं चाहिए, हमें गांधी की तस्वीरें और मूर्तियां चाहिए। इरोम शायद ये बात नहीं समझ पाईं।

मैं इरोम की लंबी उम्र की कामना करता हूं।

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