इंसान के बच्चे सड़क पर पैदा हो रहें हैं और अस्पतालों में मर रहें हैं लेकिन हम गाय बचा कर खुश हैं

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दो घटनाएं हमारे देश के स्वास्थ सेवाओं की बदहाली की स्पष्ट नजीर हैं। एक खबर आई कि एक महिला ने सड़क पर अपने बच्चे को जन्म दिया और उसके पहले ये खबरें दिखीं कि बच्चे गोरखपुर के एक अस्पताल में घुट घुट कर मर गए। दरअसल ये दोनों ही घटनाएं हमारी स्वास्थ सेवाओं की बदहाली और उनकी विसंगतियों की ओर इशारा करती हैं। ये घटनाएं ये भी बताती हैं कि नीति निर्माताओं के लिए स्वास्थ सेवाएं कोई गंभीर मसला नहीं होती।

झारखंड के सरायकेला जिले में एक गर्भवती महिला एक स्वास्थ केंद्र में चिकित्सकीय मदद के लिए पहुंची। स्वास्थ केंद्र के डाक्टरों ने उसे ये कहकर एडमिट नहीं किया कि साथ में कोई अभिभावक नहीं है। वो महिला रात भर स्वास्थ केंद्र के पास बैठी रही। अगले दिन महिला ने बीच सड़क में एक बच्चे को जन्म दिया। जिस जगह महिला ने बच्चे को जन्म दिया वो स्वास्थ केंद्र से महज तीस मीटर की दूरी पर थी। इसके बावजूद महिला को स्वास्थ केंद्र से मदद नहीं मिली। रास्ते से लोग गुजरते रहे लेकिन महिला वहीं अपने नवजात के साथ पड़ी रही। कुछ देर बाद ओमप्रकाश नाम का एक स्थानीय व्यक्ति उधर से गुजरा। उसने महिला को अन्य महिलाओं की मदद से कपड़े से ढंका। सड़क पर ट्रैफिक रोका। इस दौरान महिला का बच्चा गर्भनाल से मां से जुड़ा रहा। स्थानीय लोगों ने फिर से स्वास्थ केंद्र में तैनात स्टाफ से मदद मांगी। एक बार फिर अभिभावक के न होने का हवाला देकर मदद से इंकार कर दिया गया। हां, इतना जरूर हुआ कि डाक्टर ने बच्चे की गर्भ नाल काट दी गई। आखिर ओमप्रकाश और अन्य लोगों ने किसी तरह एक ऑटो रिक्शा से मां बच्चे को अन्य अस्पताल में भर्ती कराया। फिलहाल दोनों ठीक हैं।

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देश में स्वास्थ सेवाओं की बदहाली की अब तक की कुरूपतम तस्वीरों में से एक गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज से आई तस्वीरें रहीं। ऑक्सीजन की कमी से अस्पताल में भर्ती बच्चों की मौत हो गई। दुखद ये रहा कि इसके बाद ये पूरा घटनाक्रम राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप की भेंट चढ़ गया। ऐसे में इस इलाके में स्वास्थ क्षेत्र से जुड़े कई गंभीर सवाल अनुत्तरित ही रह गए। गोरखपुर और आस पास के इलाकों में लगभग तीन दशकों से जापानी इंसेफ्लाईटिस का प्रकोप है। भारत अभी तक इस बिमारी से लड़ने के लिए कार्ययोजना नहीं बना पाया है। टुकड़ों में की कई कोशिशें नौनिहालों की जिंदगी नहीं बचा पा रहीं हैं। एक मोटा आंकड़ा बताता है कि तीन दशकों से अधिक समय में जापानी इंसेफ्लाइटिस गोरखपुर, बिहार और नेपाल के 15000 बच्चों को मौत की नींद सुला चुका है।

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देश में स्वास्थ सेवाओं पर जीडीपी का तकरीबन 4.2 फीसदी खर्च किया जाता है। इसी साल मई के महीने में आई हेल्थकेयर एक्सेस एंड क्वालिटी इंडेक्स की रिपोर्ट में 195 देशों में भारत की रैंक 154 थी। ये देश में लोगों तक स्वास्थ सेवाओं के ना पहुंचने की गवाही है। ऐसे में भारत में विकास के मॉडल में कोई बड़ी खामी सी महसूस होती है। शहरी इलाकों में अस्पताल और एंबुलेंस मिल भी जाए लेकिन ग्रामीण और कस्बाई इलाके भगवान भरोसे हैं। दुखद ये है कि ये मुद्दे बीच बहस से गायब रहते हैं। हां, ये जरूर है कि ये देश अब गाय को लेकर गंभीर जरूर हो गया है लेकिन इंसानी बच्चों के लिए नहीं।

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