आवाज उठेगी बरास्ता तुम्हारे

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नारस में इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रारंभ से जुड़े रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार नरेश रुपानी जी के आक्समिक निधन से समूचा पत्रकार जगत स्तब्ध है। नरेश रुपानी जी बनारस के सबसे चर्चित टीवी पत्रकारों में से एक थे। प्रारंभ से ही बनारस की स्थानीय मीडिया से जुड़े रहने वाले नरेश रुपानी के नाम को संबोधित करने वाला हमेशा उन्हें रुपानी जी ही कहा करता था।
रुपानी जी बनारस की टीवी पत्रकारिता के एक जाने माने चेहरे थे। उनका नाम जेहन में आते ही आंखों पर मोटा चश्मा लगाए, गले में मोबाइल लटकाए और हाथों में लेटर पैड लिए एक ऐसे शख्स की तस्वीर उभर कर सामने आती है जो किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में आगे बैठना पसंद करता था। रुपानी जी न सिर्फ आगे बैठते थे बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ बैठते थे। सवालों की एक लंबी लिस्ट उनके दिमाग में पहले से ही तैयार रहती थी। स्थानीय नेताओं से लगायत राष्ट्रीय नेताओं तक को घेरने के लिए रुपानी जी पूरी तैयारी से आते थे। यह वही शख्स कर सकता है जो हर मुद्दे पर अपनी मुख्तलिफ राय रखता हो। साथ ही जिसे हर विषय के बारे में जानकारी हो। रुपानी जी में वह सबकुछ था।
बनारस में स्थानीय स्तर पर टीवी पत्रकारिता को स्थापित करने में रुपानी जी के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। रुपानी जी ने उस वक्त बनारस में पत्रकारिता की शुरुआत की जब संसाधनों का नितांत अभाव था। मोबाइल का प्रयोग भी बेहद सीमित था। लोगों के लिए प्रेस का मतलब सिर्फ अखबार ही हुआ करता था। ऐसे समय में मीडिया वालों का उदय हो रहा था। रुपानी जी ने मीडिया वालों की पहचान स्थापित करने में अपनी अहम भूमिका निभाई। स्थानीय स्तर पर जितना मजबूत नेटवर्क रुपानी जी का था उतना बड़ा नेटवर्क बनाने के लिए पत्रकारों को खासी मेहनत करनी पड़ती है। आम आदमी से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक रुपानी जी को दूर से ही पहचान लेते थे।
रुपानी जी सामाजिक जीवन में भी खासे सक्रिय रहे। झूलेलाल जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित कराने में उन्होंने जो योगदान दिया उसको नकारा नहीं जा सकता। रुपानी जी अपने जीवट के लिए हम सब के आदर्श हैं। अफसोस इस बात का है कि रुपानी जी इलेक्ट्रानिक मीडिया की लड़ाई को अधूरा छोड़ कर चले गए। पत्रकारों की मुफलिसी को रुपानी जी ने करीब से देखा था और यही वजह है कि वह चाहते थे कि इसे दूर करने के लिए गंभीर प्रयास हों। इमजा भी हमेशा ऐसे मुद्दों को उठाता रहा है। इमजा की कोशिश है कि टीवी पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों की वह श्रेणी जहां भविष्य की अनिश्चितता उम्मीदों पर हावी रहती है उनके लिए सरकारें गंभीर प्रयास करें। समाज की अंतिम पंक्ति तक की पूरी खबर हर खासो आम तक पहुंचाने वाले टीवी रिपोर्टरों में जमात में बहुतायत ऐसे हैं जो किसी दैनिक मजदूर से भी कम पर काम करते हैं। समाज की मुख्यधारा को प्रभावित करने वाले यह चेहरे अपनों के बीच बेगाने हैं। यह वही लोग हैं जो सुबह खबरों पर निकलने से पहले अपनी मोटरसाइकिल की टंकी की पेंदी मंे जा चुकी पेट्रोल की बंूदों को हिलाकर यह इत्मीनान करते हैं कि चलो आज पहुंच जाएंगे। यह वही लोग हैं जो बारहमासी मजदूरों की तरह रोज खटते हैं और वक्त मिले तो अपने लिए सबसे सस्ता मोबाइल टैरिफ तलाशते हैं। एक मिनट की फुटेज के लिए अपनी जान लड़ा देने वाले इन टीवी वालों को शाम की बुलेटिन में चली खबर अफीम से कहीं अधिक नशा देती है। लेकिन अफसोस कि इनका हर नशा रात में इनके बच्चों के स्कूलों से आई फीस न जमा की होनी नोटिसों के साथ काफूर हो जाता है। कोई नीतिगत निर्णय सरकारें इन टीवी पत्रकारों के लिए नहीं ले पाईं हैं। इमजा की कोशिशें हैं कि ऐसे पत्रकारों के लिए गंभीर प्रयासांे की मुहिम शुरू की जा सके। आइए आप और हम साथ आएं। मिलें, चलें और मुकाम तक पहुंचे। रास्ता भी हमें खुद बनाना है और उसे तय भी खुद ही करना है। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक आवाज हम उठा रहे हैं। जरूरत आपकी और आपके सहयोग की है।

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