आपको साईकिल चलाने में शर्म आती और आप पर्यावरण दिवस मनाते हैं, छी छी।

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जरा याद करिए कि आपने पिछली बार साईकिल कब चलाई थी। नहीं याद आ रहा। चलिए छोड़िए। पर्यावरण दिवस तो मनाया ही होगा। नहीं भी मनाया तो दिल में मनाने की इच्छा तो जागृत ही हुई होगी। ठीक है, हमारी पीढ़ी पर्यावरण दिवस ही मनाएगी।

सुनने में ये सच्चाई जरा कड़वी लग सकती है लेकिन घोंट लीजिए क्योंकि इसके अलावा कोई चारा नहीं है। आपको हमको, हम सबको सुनना ही पड़ेगा। पांच जून को पर्यावरण दिवस मनाने वाला विश्व पर्यावरण के संरक्षण को लेकर बेहद बंटा हुआ है। भले ही अब अमेरिका के राष्ट्रपति पेरिस समझौते से बाहर निकल गए हों लेकिन जो साथ हैं वो भी कोई खास गुल नहीं खिला पा रहें हैं।

दुनिया में तेजी से पर्यावरणीय बदलाव हो रहें हैं। दुनिया का ग्रीन कवर तेजी से कम होता जा रहा है। खास तौर पर विकासशील देशों में हालात अधिक खराब हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक एक साल में 1,30,000 स्क्वेयर किलोमीटर के करीब वन खत्म कर दिए जाते हैं। सीधी भाषा में लगभग 1.5 सेकेंड में एक फुटबॉल के मैदान के बराबर वन खत्म हो जाता है। वनों के खत्म होने की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है।

तकरीबन 51 हजार हेक्टेयर से अधिक का रेगिस्तान इस डिफॉरेस्ट्रेशन की वजह से पैदा हो रहें हैं। ये पोलैंड या न्यू मेकिस्को सिटी के बराबर का क्षेत्रफल है। इस आंकडे के साथ आपको याद रखना होगा कि दुनिया में पहले से ही रेगिस्तान मौजूद हैं और वहां लोग भुखमरी से जूझ रहें हैं।

भारत में भी हालात तेजी से खराब हो रहें हैं। प्राकृतिक वन संपदा तेजी से कम हो रही है और प्रकृति जनित विषमताएं बढ़ती जा रहीं हैं। वॉटर रिजार्ज करने वाले वन कम होने से पानी की किल्लत तेजी से बढ़ रही है। ‘नेचर’ नाम के जर्नल में छपने वाले एक शोध के मुताबिक दुनिया में प्रति व्यक्ति पेड़ों का औसत 422 है। भारत की हालत बेहद खराब है और यहां पेड़ों की संख्या और आबादी के हिसाब से प्रति व्यक्ति महज 28 पेड़ों का औसत आता है। युनाइटेड स्टेट्स में ये औसत 716 का है।

दुनिया के पर्यावरण को बचाने के लिए तेजी से प्रयास हो रहें हैं हालांकि ये भी एक सच है कि भारत में पर्यावरण को लेकर चिंता बेहद सीमित है। पर्यावरण दिवस जैसे आयोजन एक सामान्य प्रक्रिया जैसे हो गए हैं जिन्हें बस पूरा कर दिया जाता है।

वैसे साईकिल चलाना पर्यावरण को बचाने जैसा काम है। भारत जैसे विकासशील देश में साईकिल चलाना भले ही एक लो स्टैंडर्ड काम माना जाता हो लेकिन दुनिया के कई ऐसे देश हैं जहां साईकिल पूरी शान से चलाई जाती है। नीदरलैंड जैसे देश में तो 98 फीसदी लोगों के पास साईकिल है। जर्मनी में 75 फीसदी आबादी के पास साईकिल है वो इसका नियमित प्रयोग करते हैं।

कुछ समझे। पेड़ लगाने से ही नहीं, पर्यावरण बचाने के लिए साईकिल भी चलानी पड़ेगी।

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