आपका इंटरनेट आपकी निजता का रोज हनन करता और वो भी आपके सामने

172

आज की दुनिया में इंटरनेट से कोई भी अछूता नहीं है। आप खुद भी अब हर पल इंटरनेट से जुड़े रहना चाहते हैं। हालांकि राइट टू प्राइवेसी के बहस मुहासिबों में आप ये नहीं चाहेंगे कि आपकी मर्जी के बिना कोई आपके बारे में जानकारियां इकट्ठा करता रहे। लेकिन आपके चाहने ना चाहने से अब अधिक फर्क नहीं पड़ता। भले ही भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकार मान ले लेकिन इसके बावजूद इंटरनेट बड़ी चालाकी से आपकी जेब में बैठकर आपकी जासूसी कर रहा है और आपकी जानकारी सर्विस प्रोवाइडरों तक पहुंचा रहा है।

हो सकता है कि इस जासूसी का परिणाम आपको दिखने भी लगा हो लेकिन आप उसे पकड़ नहीं पा रहें हों। दरअसल आपकी जेब में पड़ा मोबाइल और उसमें चलता इंटरनेट आपकी जासूसी हल पल कर रहा है। हालांकि ये कुछ हद तक आपकी मर्जी से हो रहा है लेकिन आप खुद भी इसके परिणाम और दुष्परिणाम से वाकिफ नहीं हैं। इस बात को आप कुछ यूं समझिए। मान लीजिए आपने किसी शहर में किसी बड़े मॉल में घूमने का प्लान बनाया। आप मॉल में पहुंचे और आपकी जेब में आपका मोबाइल है और उसमें इंटरनेट के जरिए लोकेशन सर्विस ऑन है। आप खुद ब खुद उस मॉल में चेकइन हो जाएंगे। आपका वेबब्राउजर आपके इस चेकइन की जानकारी सोशल साइट्स और उस मॉल के लिए विज्ञापन करने वाले सर्विस प्रोवाइडर तक पहुंचा देगा। इसके बाद आपको नियमित तौर पर उस मॉल से जुड़े विज्ञापन दिखने शुरु हो जाएंंगे।

इसके लिए एक और उदाहरण लिया जा सकता है। ये उदाहरण आप खुद आजमा सकते हैं और शायद ऐसा आपके साथ हो भी रहा हो। दरअसल जब आप अपने मोबाइल या लैपटॉप पर वेब ब्राउजिंग करते हैं तो इंटरनेट आपके ब्राउजिंग पैटर्न को सुरक्षित कर लेता है। आमतौर पर ये फेसबुक, यू ट्यूब जैसी वेबसाइट्स पर अधिक होता है। आपके ब्राउजिंग पैटर्न का डेटा इन सोशल साइट्स तक पहुंचा दिया जाता है। आप जिन लिंक्स को क्लिक करते हैं उन लिंक्स का पैटर्न सुरक्षित कर लिया जाता। आपकी रुचि की जानकारी बिना आपकी मर्जी के सर्विस प्रोवाइडरों तक पहुंच रही है। आप जब दोबारा ऐसी वेबसाइट्स पर विजिट करते हैं तो पहले से सेव ब्राउजिंग पैटर्न के मुताबिक आपको वेबसाइट्स के लिंक दिखाए जाने लगते हैं।

इस व्यवस्था का दुष्परिणाम समझना जरूरी है। आपकी वेब ब्राउजिंग पैटर्न को सोशल साइटें सुरक्षित कर लेती हैं और इसके बाद मुख्य रुप से उसी पैटर्न की फीड आपको मिलेगी। यानी आपके ज्ञान का दायरा सीमित कर दिया जाएगा। इसके बाद इंटरनेट आपके लिए ज्ञान का भंडार कम और रुचि को संतुष्ट करने का माध्यम भर रह जाएगा।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही निजता के अधिकार को मूल अधिकार का दर्जा दे दिया हो लेकिन जाने अनजाने हम अपने ही अधिकारों का हनन कर दे रहें हैं। इंटरनेट की दुनिया में आने के बाद अब ये मानना मानों बेवकूफी होगी कि आप छुपे और सुरक्षित हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here