अफ़सोस हम लाचार हैं, हम भारतीय जो हैं

124
आतंकवाद के खिलाफ भारत की जंग अब दिशाहीन हो चली है। पाकिस्तान को हर बार दोषी ठहरा कर अपनी गरदन बचा लेने का नतीजा है कि देश के अलग अलग हिस्सों में पिछले 10 सालों में तीन दर्जन से अधिक आतंकवादी हमले हुए हैं और इनमें 1000 से अधिक लोगों की मौत हुईं हैं। देश का कोई कोना ऐसा नहीं बचा है जहां आतंकवादियों ने अपनी दहशत न फैलायी हो। दिल्ली से लेकर बंगलुरू तक, आसाम से लेकर अहमदाबाद तक दहशतगर्दों ने आतंक फैला रखा है। इन आतंकियों के आगे देश का नागरिक लाचार है। वह जानता है कि उसकी जान खतरे में है। 
सुरक्षा एजेंसियों की एक बड़ी फौज है देश के पास लेकिन इनका काम त्यौहारों पर एलर्ट जारी करने से अधिक कुछ भी नहीं रह गया है। यह बात सुनने में अच्छी भले ही न लगे लेकिन देश की आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन एजेंसियों पर है वो आम नागरिकों का विश्वास खो चुकी हैं। धमाके दर धमाके होते रहते हैं और सुरक्षा एजेंसियों को भनक तब तक नहीं लगती जब तक किसी न्यूज चैनल पर विस्फोट की खबर न चलने लगे। सवाल पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार का घुन इन एजेंसियों को भी लग चुका है। क्या इन एजेंसियों के अफसरों ने मान लिया है कि आतंकवाद का खात्मा नहीं हो सकता। या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। कुछ भी हो भुगतना देश के नागरिकों को पड़ रहा है।
सियासी दांवपेंच का हाल यह है कि मुल्क के गुनहगारों को पालना हमारी मजबूरी हो जाती है। हमें कई साल लग जाते हैं इस बात का निणर्य करने में कि आतंकवादी को फांसी दे या नहीं। भले ही इसके पीछे न्यायप्रक्रिया का सुस्त होना एक अहम कारण हो लेकिन पुलिसिया कार्रवाई भी तेज नहीं कही जा सकती है। इन सब का फायदा भारत के खिलाफ साजिश रचने वालों को मिलता है। पालिटिकल सिस्टम में पैदा हुए लूप होल्स ने देश को खोखला किया है। इस बात में अब कोई दो राय नहीं है। स्वार्थ की राजनीति में देश को गर्त में भेज रहे हैं नेता। देश की आंतरिक सुरक्षा दांव पर लगा दी है। 
 इस सब के बावजूद सवाल यही है कि आखिरकार आतंकवाद के नासूर से मुक्ति मिलेगी कैसे। क्या देश को बयानों के जरिए आतंकवाद से मुक्ति मिल सकती है। क्या यह दिलासा दे देने से कि जल्द ही गुनाहगार पकड़े जाएंगे नागरिकों की जिंदगी सुरक्षित हो जाएगी। मुआवजा कभी भी इस देश के नागरिकों को इस बात की तसल्ली नहीं दिला सकता कि अगली बार आतंकी हमला इस देश पर नहीं होगा। न ही इस बात की कि अब कभी उनका अपना कोई जख्मी नहीं होगा। वक्त अब यह सोचने का नहीं रहा कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। वक्त सबकुछ ठीक करने के लिए कदम बढ़ाने का है। वक्त निर्णायक जंग का है। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here