अभिव्यक्ति की आजादी है तो आंटी को बुलाएंगे नहीं तो महिला पत्रकार का रेप कर देंगे

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आने वाले कई पीढ़ियों और बीती कई पीढ़ियों ने ऐसे हालातों का ऐसा संक्रमण शायद ही कभी देखा हो जैसा ये पीढ़ी देख रही है। यही वो पीढ़ी है जो अभिव्यक्ति की आजादी के लिए शायद अब तक की सबसे मुखर पीढ़ियों में से एक है और यही पीढ़ी अभिव्यक्ति की आजादी के माएनों को समझने के संघर्ष की गवाह भी है। हाल में कई ऐसे वाक्ये हुए जिनसे कई बार लगा कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक कशमकश सी हो गई है। ऐसे वाक्ये भी सामने आए जब अभिव्यक्ति की आजादी ने अपने आजाद होने के सबूत भी दिए।

हाल ही में एक रैप सिंगर का एक गाना अभिव्यक्ति की आजादी के स्टोर रूम से निकाल कर शोरूम में टांग दिया गया है। इस रैप सिंगर का नाम है ओमप्रकाश मिश्रा। मुल्क आजाद है कि लिहाजा ओमप्रकाश ने इस आजादी का पूरी तसल्ली से पोस्टमार्टम किया है। हुजूर-ए-आला अपने को रैप सिंगर कहते हैं। दो साल पहले ओम ने एक गाना लिखा था जिसमें एक शख्स एक आंटी नुमां महिला को संबोधित करते हुए गाना गा रहा है। इस गाने के बोल खासे आपत्तिजनक हैं और दोहरे अर्थ वाले हैं।

हालांकि इस गाने को दो साल पहले गाया गया था लेकिन ना जाने कैसे ये अब वायरल हो रहा है। ये गाना जैसे ही वॉयरल हुआ एक महिला पत्रकार ने इस पर आपत्ति जताई और यूट्यूब से इसे हटाने को कहा। यू ट्यूब ने इसे हटाया भी पर भाई लोगों ने इसे फिर अपलोड कर दिया। फिलहाल तलाशेंगे को ये गाना आपको यू ट्यूब पर मिल जाएगा।

बात इतनी भर होती तो भी चल जाता। गाने के बोल पर आपत्ति जताए जाने के बाद एक ऑनलाइन मुहिम चलाई गई। रैप सिंगर और गाने के पैरोकारों ने अभिव्यक्ति की आजादी का लबादा ओढ़ा और दिल्ली के कनाट प्लेस पर इस गाने को कोरस में गाने का ऐलान कर दिया। तय तारीख पर लोग जुटे और कोरस में यही गाना गाया गया।

बात इससे भी आगे बढ़ी। महिला पत्रकार का मोबाइल नंबर सार्वजनिक किया गया। इसके बाद तो हद ही हो गई। महिला पत्रकार को बलात्कार कर देने की धमकियां मिलने लगीं।

शायद आप और हम अभिव्यक्ति की आजादी के इस भयावह पहलु के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। आप गाना बना सकते हैं, गा सकते हैं, अपने मन की भड़ास को उगल सकते हैं लेकिन क्या अभिव्यक्ति की आजादी के लिए बलात्कार भी कर सकते हैं? तार्किक तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र के लिए बेहद अहम समझ में आती है लेकिन राजनीतिक परिपेक्ष्य से हटकर इसका प्रयोग कुछ कुरूप सा होता जा रहा है। कम से कम महिलाओं के संदर्भ में ऐसी घटनाओं की उम्मीद नहीं की जा सकती है। हालात ऐसे ही रहे तो एक समय इस अभिव्यक्ति को गुलाम करने की आवाज उठानी पड़ेगी।

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