अंगुलियों पर गिनी जानी वाली मौतें अब मुट्ठियां भरने लगीं हैं

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गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पांच दर्जन से अधिक बच्चों की मौतें भारत के आधुनिक इतिहास में ना भूला जाना वाला अध्याय होगा। परमाणु शक्ति संपन्न देश में अगर अस्पताल में भर्ती बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हो जाए तो इससे अधिक भयावह कुछ नहीं हो सकता। छोटे बच्चों की मौत से पनपी असहनीय पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब जिम्मेदार तंत्र ये मानने को तैयार नहीं होता कि मौतें उसकी लापरवाह व्यवस्था की देन हैं।

गोरखपुर और आसपास का इलाका जापानी इंसेफ्लाइटिस से आज से नहीं 1972 से पीड़ित है। चालीस सालों में तकरीबन 25 हजार बच्चों की मौत इस इलाके में हो चुकी है। चालीस सालों का समय कम नहीं होता है। इस दौरान देश का पूरा ढांचा बदल चुका है। कागजों में देश विकास की गाड़ी में बैठा सरपट भाग रहा है। हालांकि इस दौरान स्वास्थ, खास तौर पर बच्चों का स्वास्थ किसी भी सरकार के लिए गंभीर विषय नहीं रहा है।

स्वास्थ सेवाओं पर खर्च करने वाले हम दुनिया के देशों की सूची में खासा नीचे हैं। अपनी जीडीपी का महज 2.5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ सेवाओं पर खर्च करने वाला देश अपने नौनिहालों की सुरक्षा की गारंटी किसी भी रूप में नहीं ले सकता है। हमारे आस पास के पड़ोसी देश जिन्हें हम खुद से छोटा मानते हैं वो भी इस मामले में हमसे बेहतर हैं।

गोरखपुर में जो कुछ हुआ उसके लिए कोई एक सरकार दोषी नहीं है। पूरी व्यवस्था ही इस सामूहिक बाल संहार के लिए दोषी है। हमारे लिए स्वास्थ सेवाएं महज अस्पताल खोल देने भर की भी गुंजाइश नहीं रखती हैं। अस्पताल खुले भी तो उनमें से अधिकतर में जरूरी साधन भी उपलब्ध नहीं रहते। कुछ महीनों पहले खुद मैंने उत्तर प्रदेश के सीतापुर में एक गर्भवती की परेशानी का जिक्र कर सिस्टम पर सवाल उठाया था। आप उस पोस्ट को इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

तीन हेलिकॉप्टरों के काफिले में चलते प्रधानमंत्री और ठेले पर लदी गर्भवती।

हालांकि हम जैसों की आवाजें कहीं गुम सी हो जाती हैं। सिस्टम तक हम अपनी बात नहीं पहुंचा पाते। खैर मसला यहां हमारे असफल होने का नहीं है, सवाल व्यवस्था के असफल होने का है। व्यक्ति की असफलता सिर्फ व्यक्ति या उसके कुनबे तक सीमित रहती है लेकिन व्यवस्था की असफलता पूरे समाज को परेशान कर देती है। गोरखपुर में कुछ ऐसा ही हुआ है।

 

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